दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि किसी भी अविवाहित मृतक(पुरुष) के जमे हुए वीर्य का नमूने उसके माता-पिता या कानूनी उत्तराधिकारियों को जारी करने के लिए देश में कोई कानून नहीं है। सर गंगा राम अस्पताल की ने उच्च न्यायालय के समक्ष दायर एक हलफनामे में कहा कि केंद्र सरकार के राजपत्र में सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी(एआरटी) अधिनियम में ऐसे नमूने के निपटान या उपयोग की प्रक्रिया को निर्दिष्ट नहीं किया गया है। एक दंपति की ओर से दायर याचिका पर अस्पताल की प्रतिक्रिया दी है। इसमें सर गंगा राम अस्पताल के एक केंद्र से उनके मृत बेटे के जमे हुए वीर्य(फ्रोजन सीमन) के नमूने को जारी करने के निर्देश देने की मांग की गई है।
हाईकोर्ट ने पिछले साल दिसंबर में इस याचिका पर अस्पताल और दिल्ली सरकार से जवाब मांगा था। अस्पताल के अनुसार दिशानिर्देश के अभाव में मृतक के इस जमे हुए नमूने का अंतिम निपटान करने में असमर्थ था। हलफनामे में कहा गया है कि एआरटी (सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी) अधिनियम, आईसीएमआर के दिशा निर्देश, सरोगेसी विधेयक/ अधिनियम में अविवाहित मृत पुरुषों के कानूनी उत्तराधिकारियों के लिए वीर्य का नमूना जारी करने के बारे में कोई कानूनी प्रावधान नहीं है।
एआरटी विनियमन अधिनियम, 2021 में हालिया राजपत्र में कानून और न्याय मंत्रालय ने भी अविवाहित व्यक्ति के वीर्य के नमूने के निपटान या उपयोग के लिए प्रावधानों का उल्लेख नहीं किया है। अस्पताल ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के एक फैसले के अनुसार अपने अविवाहित मृत बेटे के जमा हुए नमूने पर केवल पत्नी का अधिकार है। इस मामले में याचिकाकर्ता के अविवाहित बेटे ने कैंसर से पीड़ित होने के बाद कीमोथेरेपी शुरू होने से पहले 2020 में अपने वीर्य के नमूने को फ्रीज कर दिया था। याचिका में कहा कि 30 साल की उम्र में मृत बेटे का एकमात्र जीवित उत्तराधिकारी होने के नाते उनके शरीर के अवशेषों पर पहला अधिकार है। उन्होंने कहा कि मृतक के शुक्राणु हासिल करने का उद्देश्य मृत बेटे की विरासत को जारी रखना है।