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Delhi : हाईकोर्ट ने कहा- अदालत के धैर्य की परीक्षा न लें दिल्ली सरकार और डीडीए, इस बात पर जताई नाराजगी

Sat, 26 Apr 2025 06:59 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली

सार

हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार और दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) को फटकार लगाते हुए चेतावनी दी कि अदालत के धैर्य की परीक्षा न लें।
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Delhi High Court - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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जिला न्यायिक अधिकारियों के लिए सरकारी आवासों के निर्माण में हो रही देरी पर हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार और दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) को आड़े हाथ लिया है। दिल्ली सरकार और डीडीए को फटकार लगाते हुए चेतावनी दी कि अदालत के धैर्य की परीक्षा न लें। मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय व न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की पीठ ने कहा कि अदालत के पूर्व के अनुरोध पर कोई ध्यान नहीं दिया गया और अदालत को वस्तुत: भीख मांगनी पड़ती है।

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  उक्त टिप्पणी के साथ अदालत ने आयुक्त (भूमि प्रबंधन) को न्यायिक अधिकारियों के लिए वैकल्पिक फ्लैटों की उपलब्धता सहित उसके आदेशों के अनुपालन के लिए उठाए गए कदमों पर एक हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया। साथ ही डीडीए के निदेशक (संस्थागत भूमि) को मई में होने वाली अगली सुनवाई में उपस्थित रहने को कहा।

सुनवाई के दौरान डीडीए के वकील ने कहा कि दो सप्ताह के भीतर औपचारिक आवंटन पत्र जारी कर दिया जाएगा और इसकी सूचना न्यायालय और सरकार को दी जाएगी। जवाब में पीठ ने कहा कि पत्र जारी होने के बाद राशि जारी कर दी जाएगी।
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इससे पहले अदालत ने डीडीए को कहा था कि शाहदरा में सीबीडी ग्राउंड में फ्लैटों के निर्माण के लिए जमीन आवंटित की गई है, लेकिन इस संबंध में कोई औपचारिक पत्र जारी नहीं किया गया। दिल्ली सरकार द्वारा औपचारिक आवंटन पत्र के अभाव में फ्लैटों के निर्माण के लिए अपेक्षित राशि पर निर्णय नहीं लिया जा सका।

पीठ ने पूछा कि क्या सरकारी अधिकारी न्यायिक आदेश नहीं पढ़ते हैं। पीठ ने दिल्ली सरकार को द्वारका में फ्लैटों के लिए राशि जारी करने पर बैठक बुलाने पर सकारात्मक निर्णय लेने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया। द्वारका में पहले एक इमारत बनाई गई थी, लेकिन घटिया और दोषपूर्ण निर्माण के कारण उसे ध्वस्त कर दिया गया था।

अदालत न्यायिक सेवा संघ द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इसमें दिल्ली न्यायिक सेवा अधिकारियों और दिल्ली उच्च न्यायिक सेवा अधिकारियों को सरकारी आवास की उपलब्धता में तेजी लाने के लिए निर्देश देने की मांग की गई थी।

पैरोल मामलों में संवेदनशील हों जेल अधिकारी : हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने हाल ही में जेल अधिकारियों से कैदियों की पैरोल के अनुरोध को अधिक संवेदनशीलता के साथ संभालने का आग्रह किया। न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने कहा कि कैदियों को संपत्ति के रूप में नहीं माना जा सकता है, जो बुनियादी मानवाधिकारों से रहित हैं।

अदालत ने यह टिप्पणी दुष्कर्म और हत्या के एक दोषी की पैरोल चार सप्ताह बढ़ाते हुए की, जो आजीवन कारावास की सजा काट रहा है, जिसमें से 20 वर्ष वह पहले ही जेल में काट चुका है।कैदी की पैरोल का विरोध इस आधार पर किया गया कि जेल में उसका आचरण ठीक नहीं था। इस संबंध में अधिकारियों ने कोर्ट को बताया कि कैदी ने 2022 में आत्महत्या करने का प्रयास किया था। अदालत ने कहा कि जेल प्राधिकारियों को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि आत्महत्या का प्रयास मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति को दर्शाता है। 

धर्म के नाम पर ठगने वाले को अग्रिम जमानत नहीं
धर्म के नाम पर महिला व उसके बेटे से 5.63 करोड़ की ठगी करने के आरोपी धार्मिक उपदेशक मनु वाधवा को अग्रिम जमानत देने से इन्कार करते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की है। न्यायमूर्ति गिरीश कठपालिया की पीठ ने कहा कि जीवन के बुरे वक्त में भोले-भाले लोग धार्मिक उपदेशकों के नाम पर प्रलोभनों का शिकार हो जाते हैं और इस सच्चाई को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

अदालत ने कहा कि धोखाधड़ी से प्राप्त की गई राशि का पता लगाने के लिए आरोपी को हिरासत में लेकर पूछताछ करने की जरूरत है, ऐसे में आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज की जाती है। उपदेशक ने महिला व उसके बेटे को विश्वास दिलाया कि वह निवेश से अमीर बन जाएगी। 

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