दिल्ली हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार के एक मामले में 18 वर्ष बाद दिल्ली पुलिस की एक महिला अधिकारी को राहत प्रदान कर दी। अदालत ने निचली अदालत द्वारा प्रदान सजा को रद्द करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों में कई खामियां हैं और बिना शक अपराध साबित नहीं होता।
न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने अपने 30 पृष्ठों के फैसले में महिला अधिकारी सुदेश कौशिक की सजा रदद करते हुए कहा कि पेश इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य विश्वसनीय नहीं है। इसके अलावा कई अहम गवाहों से पूछताछ नहीं की गई।
अदालत ने बचाव पक्ष के उस तर्क को स्वीकार कर लिया कि जिस कॉफी हाउस में उनकी मुवक्किल को कथित रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किया गया था, उसके मैनेजर या किसी अन्य को गवाह नहीं बनाया गया। इसके अलावा आरोप के अनुसार, जिस वसंत विहार थानाध्यक्ष की ओर से वह रिश्वत की राशि ले रही थी, उनके बयान तक सीबीआई ने दर्ज नहीं किए। स्पष्ट है कि उनकी मुवक्किल को फर्जी मामले में फंसाया गया है। ऐसे में निचली अदालत के फैसले को रद्द कर उनकी मुवक्किल को रिहा किया जाए।
पेश मामले के अनुसार, शिकायतकर्ता गगन हून को आरोपी ने 9 अप्रैल 2004 को थाने में बुलाया और कहा कि उसके खिलाफ एक शिकायत आई है। इसके बाद थानाध्यक्ष ने उसके आरोपी से सहयोग करने के लिए कहा और उससे 12 हजार रुपये की रिश्वत मांगी। इसके बाद सीबीआई ने 15 अप्रैल 2004 को रिश्वत की राशि से पहली किश्त के रूप में दो हजार रुपये लेते हुए उन्हें गिरफ्तार कर लिया। निचली अदालत ने साक्ष्यों के आधार पर सुदेश कौशिक को 30 जुलाई 2009 को दोषी ठहरा दिया और एक वर्ष कैद व दो हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।