अदालत ने आदेश दिया कि नागरिक एजेंसियों द्वारा पोस्टर इत्यादि हटाने पर किए गए खर्च का भुगतान पहले दिल्ली विश्वविद्यालय करेगा और उसके पास लिंगदोह समिति की सिफारिशों के अनुसार संबंधित उम्मीदवारों से इसे वसूलने का अधिकार होगा।
कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश मनमोहन और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की खंडपीठ ने निर्देश दिया कि जब तक न्यायालय संतुष्ट नहीं हो जाता कि पोस्टर, स्प्रे पेंट और भित्तिचित्र हटा दिए गए हैं और सार्वजनिक संपत्तियों को बहाल कर दिया गया है तब तक मतगणना नहीं की जाएगी। पीठ ने कहा कि हालांकि चुनाव प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है। मतदान 27 सितंबर को होना है। मतगणना 28 सितंबर को होनी थी।
अदालत अधिवक्ता प्रशांत मनचंदा द्वारा 2017 में दायर याचिका पर विचार कर रही है, जिसमें सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने वाले उम्मीदवारों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई थी। याचिका में उन क्षेत्रों के नुकसान को हटाने और उनका नवीनीकरण करने की भी मांग की गई थी।
मनचंदा ने हाल ही में डूसू चुनावों के दौरान हुई तोड़फोड़ और नुकसान के खिलाफ एक नई याचिका दायर की थी। दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों के एक समूह द्वारा एक और नई याचिका दायर की गई थी, जिसमें विश्वविद्यालयों में छात्र चुनावों के संचालन से संबंधित लिंगदोह समिति की सिफारिशों के उल्लंघन को उजागर किया गया था।
सुनवाई के दौरान दिल्ली विश्वविद्यालय के वकील ने अदालत को बताया कि बुधवार को एक आपात बैठक आयोजित की गई थी, जिसमें कुल 21 में से 16 उम्मीदवारों ने भाग लिया था। वकील ने अदालत को बताया कि उम्मीदवारों से सार्वजनिक दीवारों और संपत्तियों पर लगे पोस्टर और भित्तिचित्रों को हटाने के लिए हलफनामा दाखिल करने को कहा गया था। उन्होंने स्वीकार किया कि चुनाव प्रक्रिया में लिंगदोह समिति की सिफारिशों का घोर उल्लंघन हुआ है।