शीर्ष अदालत के नालसा फैसले का जिक्र करते हुए पीठ ने कहा कि उस फैसले के अनुसार ट्रांसजेंडरों को अपने स्वयं के पहचान वाले लिंग का फैसला करने का अधिकार है और उस अधिकार को बरकरार रखा गया है। पीठ ने कहा इसका मतलब है कि एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति खुद लिंग का फैसला करेगा और आप उसका पालन करेंगे। यह आग्रह अनुच्छेद 21 के अधिकार का उल्लंघन है।
पीठ एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई कर रही है जो अधिकारियों द्वारा नाम और लिंग में बदलाव के साथ पासपोर्ट जारी न करने से व्यथित है। उच्च न्यायालय ने मई 2021 में विदेश मंत्रालय से उस याचिका पर जवाब मांगा था जिसमें दावा किया गया था कि याचिकाकर्ता को बदले हुए नाम और लिंग के तहत आधार कार्ड, पैन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र जारी किया गया है, लेकिन पासपोर्ट नहीं।
चूंकि याचिकाकर्ता के आधार कार्ड, वोटर आईडी के साथ-साथ उसके पैन कार्ड सहित सभी दस्तावेज उसे 2 दिसंबर 2019 के हलफनामे के आधार पर नाम और लिंग में आवश्यक परिवर्तन के साथ जारी किए गए हैं। याचिका में कहा गया है कि वह अपने अन्य दस्तावेजों में किए गए परिवर्तनों के समान ही अपना नया पासपोर्ट जारी करने की भी हकदार है।
याचिकाकर्ता जो एक पुरुष के रूप में पैदा हुआ था और बाद में 2019 में एक हलफनामे पर एक स्व-घोषणा के माध्यम से अपने लिंग को महिला में बदल दिया ने पासपोर्ट नियम 1980 के तहत एक अस्पताल से लिंग-परिवर्तन प्रमाण पत्र जमा करने की आवश्यकता को भी चुनौती दी है।
अधिवक्ता सिद्धार्थ सीम और ओइंड्रिला सेन के माध्यम से दायर याचिका में याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि लिंग परिवर्तन प्रमाण पत्र की आवश्यकता अवैध और असंवैधानिक है और विभाग ने कई ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अपने स्वयं के पहचान वाले लिंग को दर्शाने के लिए पासपोर्ट प्राप्त करने से रोका है।
याचिकाकर्ता ने पहले ही बैंकॉक में एक विश्वसनीय डॉक्टर से फेशियल फेमिनाइजेशन सर्जरी करवाई है। वह बैंकॉक में उसी डॉक्टर से अपनी बाकी की लिंग पुनर्मूल्यांकन प्रक्रियाओं, सर्जरी से गुजरना चाहती है। वर्तमान में याचिकाकर्ता के पास पासपोर्ट नहीं है और भविष्य की सर्जरी के लिए कहीं भी यात्रा करने में असमर्थ है।