उच्च न्यायालय ने आखिर चार माह की ज्यादा चली सुनवाई के बाद दिल्ली दंगों के मामले में आरोपी उमर खालिद की जमानत पर फैसला सुरक्षित रख लिया। खालिद ने निचली अदालत द्वारा उसकी जमानत आवेदन खारिज करने संबंधी फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी है। इस मामले में करीब 20 दिन से अधिक समय तक बहस चलती रही।
खालिद के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता त्रिदीप पेस ने दलील दी कि विशेष अदालत ने कोई निष्कर्ष नहीं दिया है कि अमरावती में उनका भाषण उत्तेजक है। खालिद द्वारा अपने भाषण में इस्तेमाल किए गए 'सब चंगा सी' जैसे वाक्यांश एक व्यंग्य के रूप में हैं और किसी भी व्यक्ति को 500 दिनों से अधिक समय तक सलाखों के पीछे नहीं रखा जा सकता क्योंकि उसने वाक्यांश का इस्तेमाल किया था या क्योंकि उसने जुमला शब्द का इस्तेमाल किया था। खालिद का नाम दंगों के दौरान हिंसा से संबंधित किसी भी प्राथमिकी में नहीं है, लेकिन उसके खिलाफ प्राथमिकी तब दर्ज की गई जब पुलिस ने रिपब्लिक टीवी और न्यूज18 पर उसके भाषण के फुटेज देखे गए।
वहीं एसपीपी अमित प्रसाद ने कहा कि उमर खालिद की विभिन्न व्हाट्सएप समूहों की सदस्यता जिनके सदस्यों को दिल्ली में हिंसा के लिए गिरफ्तार किया गया है, दंगों के पीछे एक साझा साजिश थी और खालिद इसके मास्टरमाइंड में से एक था। उमर खालिद और अन्य के भाषणों में कश्मीर, तीन तलाक और सीएए/एनआरसी के समान विषय थे। इसका उद्देश्य अल्पसंख्यक समुदाय में भय की भावना पैदा करना था।
सभी अलग-अलग आरोपी समूहों का हिस्सा थे, कई बार मिले और साजिश रची। उनका प्रयास देश को अस्थिर करने और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प सहित अंतर्राष्ट्रीय नेताओं के सामने इसकी छवि खराब करने का था। खालिद और अन्य शाहीन बाग सहित प्रत्येक विरोध स्थल का प्रबंधन कर रहे थे, और प्रयास अल्पसंख्यकों में असंतोष पैदा करना था।
खालिद को दिल्ली पुलिस ने सितंबर 2020 में गिरफ्तार किया था और उस पर आपराधिक साजिश, दंगा, गैरकानूनी रूप से इकट्ठा होने के साथ-साथ गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम की कई धाराओं का आरोप लगाया गया है। कड़कड़ढूमा कोर्ट ने इस साल मार्च में उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी।