न्यायमूर्ति सुरेश कुमार कैत एवं न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने कहा कि पत्नी के जानबूझकर या अनजाने में नपुंसक कहे जाने के कारण पति को जो सार्वजनिक अपमान सहना पड़ा, जबकि यह एक चिकित्सीय स्थिति है। उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
पीठ ने पति की अपील स्वीकार करते हुए कहा कि पत्नी के बयानों से पता नहीं चल पाया कि पति ने कभी उसकी अवहेलना की हो या अपने वैवाहिक दायित्वों का निर्वहन करने में विफल रहा हो। हम पक्षों को सुनने के बाद यह निष्कर्ष निकालने के लिए बाध्य हैं कि अपीलकर्ता के साथ क्रूरता की गई थी। तदनुसार तलाक याचिका को खारिज करने वाले दिनांक 28 जुलाई, 2021 के विवादित फैसले को रद्द किया जाता है और हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 (1) (ड्ड) के तहत क्रूरता के आधार पर अपीलकर्ता को तलाक दिया जाता है।