उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि दिल्ली पुलिस के अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच दिल्ली सरकार की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा द्वारा की जा सकती। अदालत ने उक्त टिप्पणी करते हुए दिल्ली पुलिस के एक अधिकारी के उस तर्क को खारिज कर दिया कि उनके खिलाफ लगाए गए भ्रष्टाचार की जांच दिल्ली सरकार की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा द्वारा नहीं की जा सकती क्योंकि एजेंसी गृह मंत्रालय के अंतर्गत आती है।
न्यायमूर्ति जसमीत सिंह ने दिल्ली के अनिल कुमार बनाम जीएनसीटी फैसले का हवाला देते हुए कहा कि यह माना गया है कि चूंकि दिल्ली पुलिस के जवान राष्ट्रीय राजधानी में नागरिकों की सेवा करते हैं और एजेंसी के कार्यों को दिल्ली के मामलों से काफी हद तक और अनिवार्य रूप से संबंधित है, इसलिए दिल्ली सरकार की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा के पास दिल्ली पुलिस के एक अधिकारी के संबंध में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत शिकायत पर विचार करने और उस पर कार्रवाई करने और अपराध की जांच और मुकदमा चलाने का अधिकार है।
अदालत ने कहा भ्रष्टाचार के आरोपी केंद्र सरकार के किसी भी अधिकारी की जांच न करने की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा की महज तकनीकीता से दूर नहीं हो सकता। जब किसी प्रभारी प्राधिकारी को शिकायत की जाती है तो यह उस प्राधिकरण का कर्तव्य है कि वह उक्त आरोपों की विधिवत जांच करे। वे उचित परिश्रम के बाद मामले को संबंधित प्राधिकारी को स्थानांतरित कर सकते हैं, लेकिन उन्हें शिकायत दर्ज करते समय इसकी जांच करने का अधिकार है।
अदालत दिल्ली पुलिस में एक सब इंस्पेक्टर द्वारा रिश्वत लेने के मामले में विशेष न्यायाधीश (पीसी एक्ट) द्वारा पारित आदेश को रद्द करने और खारिज करने संबंधी दायर एक याचिका पर विचार कर रही थी। जिसमें धारा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के 7, 13(1)(डी) और 13(2) के तहत आरोप लगाया गया था।
मामले में शिकायतकर्ता ने शस्त्र लाइसेंस के लिए आवेदन किया था और यह आरोप लगाया गया था कि याचिकाकर्ता उसी के संबंध में पूछताछ के लिए उनके आवास पर गया । शिकायत में आगे कहा गया कि याचिकाकर्ता ने शिकायतकर्ता से 20 हजार रुपये की रिश्वत देने को कहा। कुछ बातचीत के बाद याचिकाकर्ता ने राशि को घटाकर 10,000 रुपये कर दी। शिकायत पर भ्रष्टाचार निवारण शाखा ने उसे रिश्वत की राशि मे से एक हजार रुपये लेते गिरफ्तार कर लिया था। जांच के दौरान आरोपी से पूछताछ की गई और उसके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई।
याची ने तर्क रखा कि उसे विभागीय कार्यवाही में दोषमुक्त कर दिया गया था और आशु सुरेंद्रनाथ तिवारी बनाम पुलिस उपाधीक्षक मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार, उसके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी नहीं रह सकती है। यह भी तर्क रखा कि वह दिल्ली पुलिस में एक सब-इंस्पेक्टर है और इस प्रकार दिल्ली सरकार की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा को दिल्ली पुलिस में कार्यरत एक सब-इंस्पेक्टर के खिलाफ अपराध की जांच करने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं था जो गृह मंत्रालय के अंतर्गत आता है।
अदालत ने कहा इस मामले में शिकायतकर्ता ने विभागीय जांच के दौरान खुद बयान दिया कि उसने समय पर सत्यापन के लिए रिश्वत की पेशकश की और याचिकाकर्ता ने इसे अस्वीकार कर दिया। अदालत ने कहा शिकायतकर्ता द्वारा मांग की रिकॉर्डिंग और उसके बाद प्राथमिकी दर्ज करना गलत लगता है और परिस्थितियों में विश्वसनीय नहीं है। अदालत ने माना कि जब विभागीय कार्यवाही और आपराधिक कार्यवाही एक दूसरे की दर्पण छवि है और याचिकाकर्ता को विभागीय जांच में योग्यता के आधार पर दोषमुक्त कर दिया गया था ऐसे में तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर आपराधिक कार्यवाही को जारी रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
अदालत ने हालांकि उसके इस तर्क को खारिज करते हुए कहा चूंकि वह दिल्ली पुलिस में एक सब-इंस्पेक्टर है, इसलिए दिल्ली सरकार की भ्रष्टाचार-निरोधी शाखा के पास अपराध की जाँच करने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है। याचिकाकर्ता का यह तर्क कि एसीबी को उनके पास की गई शिकायत के आधार पर उनके मामले की जांच करने का अधिकार नहीं होगा कायम नहीं रखा जा सकता है। केंद्र सरकार का कोई भी अधिकारी जिस पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया गया है वह केवल इस मामले से बच नहीं सकता है।
अदालत ने फिलहाल उसे राहत प्रदान करते हुए कहा कि उसे विभागीय कार्यवाही में दोषमुक्त कर दिया गया था और उसके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखने की आवश्यकता दिखाने के लिए रिकॉर्ड पर कोई पर्याप्त सामग्री नहीं है। अत: विशेष न्यायाधीश (पीसी अधिनियम) सीबीआई राउज एवेन्यू कोर्ट द्वारा पारित सभी कार्यवाही को रद्द किया जाता है।