न्यायमूर्ति सुरेश कुमार कैत और न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की खंडपीठ ने कहा कि पुराने हिंदू कानून के तहत विवाह को संस्कार माना जाता था और तलाक की कोई अवधारणा नहीं थी। हालांकि, 1955 के अधिनियम की शुरुआत के बाद चीजें बदल गईं, तलाक के लिए आधार को केवल दोष सिद्धांत के आधार पर मान्यता दी गई।
पीठ ने कहा, समय बीतने के साथ अनुभव से पता चला है कि कई बार असंगति और स्वभावगत मतभेदों के कारण शादियां नहीं चल पाती हैं, जिसके लिए किसी भी पक्ष को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है।
अदालत ने ये टिप्पणियां एक महिला द्वारा दायर अपील पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें क्रूरता के आधार पर तलाक देने के पारिवारिक अदालत के आदेश को चुनौती दी गई थी। खंडपीठ ने कहा कि दंपती के बीच विवाद पति और उसके परिवार के सदस्यों के प्रति अनादर और लगातार झगड़ों के कारण हुआ, जिसके परिणामस्वरूप विभिन्न शिकायतें हुईं।