राजधानी में चुनाव की तारीख भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व ही तय करेगा। विधानसभा भंग होना तो अब तय है, लेकिन कांग्रेस और ‘आप’ जिस तरह से जम्मू-कश्मीर और झारखंड के साथ चुनाव चाहती है, यह मांग शायद पूरी नहीं होगी।
इन दो राज्यों में चुनाव 25 नवंबर से 20 दिसंबर के बीच हैं और परिणाम 23 दिसंबर को आने हैं। ऐसे में विशेषज्ञों का कहना है कि भाजपा अगर चाहे तो आसानी से चुनाव अगले साल जनवरी-फरवरी के लिए टाल सकती है।
राजधानी में 16 फरवरी को राष्ट्रपति शासन लगाया गया था। उस हिसाब से 15 फरवरी, 2015 तक इसे जारी रखने के लिए किसी अतिरिक्त अनुमति की जरूरत नहीं है। पूर्ण राज्य के मामले में यह छूट सिर्फ 6 महीने होती है।
भाजपा ने जानबूझकर की देरी
राजनीति जानकारों का कहना है कि भाजपा पहले से ही अगले साल तक चुनाव टालना चाहती थी, यही वजह है कि विधानसभा भंग करने में देरी की गई। बेशक तीन सीट पर उपचुनाव की प्रक्रिया चल रही है लेकिन अब इसके होने की संभावना न के बराबर है।
दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने यह साफ किया है कि विधानसभा भंग करने की सूचना मिलने पर चुनाव प्रक्रिया को रद्द करने की अधिसूचना जारी की जा सकती है।
दिल्ली की राजनीति से 1977 से जुड़े एक नेता का कहना है कि भाजपा जम्मू-कश्मीर और झारखंड चुनाव के परिणाम से दिल्ली में फायदा लेना चाहेगी तो चुनाव 23 दिसंबर के बाद कराएगी, क्योंकि इन दो राज्यों के परिणाम 23 दिसंबर को आएंगे।
आसान नहीं है जल्दी चुनाव का ऐलान
अगर चुनाव पार्टी के पक्ष में रहा तो सीधे तौर पर इसका लाभ दिल्ली के चुनाव में मिलेगा। वहीं दो राज्यों के साथ दिल्ली में चुनाव कराने की बात सामने आई तो सुरक्षा इंतजाम पर भी गृहमंत्रालय और चुनाव आयोग को तैयारी परखनी होगी।
चुनाव घोषणा से पहले भी तैयारी करनी होती है। उपराज्यपाल की रिपोर्ट पर राष्ट्रपति तुरंत फैसला ले भी लें तो दोनों राज्यों के साथ चुनाव कराना आसान नहीं है। घोषणा के बाद प्रक्रिया पूरी करने के लिए एक महीने का समय चाहिए।
दिल्ली विधानसभा के पूर्व सचिव एसके शर्मा ने बताया कि अधिसूचना के साथ सात दिन नामांकन, एक दिन छंटनी, दो दिन नाम वापस लेने के अलावा कम से कम 14 दिन प्रचार के लिए होता है। फिर राजपत्रित छुट्टी या रविवार के लिए इसमें शामिल नहीं होते।
बिजली-पानी का मुद्दा भी नहीं आएगा आड़े
विधानसभा भले ही अभी भंग करने और मध्यावधि चुनाव कराने की विधिवत घोषणा नहीं हुई हो, लेकिन कयास लगाया जा रहा है कि चुनाव अगले साल फरवरी में ही होगा। भाजपा नेताओं का भी कहना है कि फरवरी में चुनाव कराना बेहतर होगा।
भाजपा रणनीतिकारों का मानना है कि इस महीने में बिजली-पानी का मुद्दा भी आड़े नहीं आएगा। ठंड में बिजली के मीटर भले ही अपने चाल से चलते है, लेकिन बिल में कमी होती है। वहीं पानी की मांग भी आपूर्ति के हिसाब से ठीक रहती है। ऐसे समय में चुनाव कराना बेहतर होगा।
नेता यह भी मानकर चल रहे है कि दिसंबर और जनवरी में मौसम खुशगवार रहेगा। लिहाजा प्रचार करने और जनसंपर्क बनाने में भी परेशानी नहीं होगी। सदस्यता अभियान के तहत भाजपा से आम जनता भी जुड़ चुकी होगी। इन सबका फायदा ही मिलेगा।