दिल्ली के विधानसभा चुनाव में सभी की नजर आम आदमी पार्टी, भाजपा और कांग्रेस पर टिकी हुई है। अलग-अलग ओपीनियन पोल्स के नतीजे भी इन्हीं तीन पार्टियों के आसपास केंद्रित नजर आ रहे हैं, लेकिन एक पार्टी ऐसी भी है जिसपर किसी ने अबतक उतना ध्यान नहीं दिया है, मगर उसका नतीजों पर गहरा असर पड़ सकता है।
हम बात कर रहे हैं बहुजन समाज पार्टी(बसपा) की, जिसने दिल्ली की सभी 70 विधानसभी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं। दिल्ली के पूर्वांचली और पंजाबी मतदाताओं को लुभाने की कोशिश तो सबने की, लेकिन इस तथ्य पर शायद ही किसी का ध्यान गया कि यहां दलित वोटरों की संख्या करीब 25 लाख है।
इसके अलावा 70 में से 12 सीटें इनके लिए आरक्षित भी हैं। इस इलकों में दलित मतदाताओं की संख्या भी बड़ी है। ऐसे में बसपा के प्रत्याशियों का मैदान में होना, पूरे समीकरण को बिगाड़ सकता है।
इससे पहले 2015 के चुनाव में आम आदमी पार्टी ने सभी 12 आरक्षित सीटें जीती थीं और बसपा के हाथ एक भी सीट नहीं लगी। 2013 में भी बसपा ने इनमें से किसी सीट पर जीत नहीं हासिल की थी। वहीं 2008 में बसपा को दो सीटें मिली थीं, जबकि पांच सीटों पर वह दूसरे स्थान पर थी।
हालांकि इस बार चुनाव की बदली हवा के बीच पूर्वांचली और पंजाबी मतदाताओं को साधने के चक्कर में किसी ने दलितों पर विशेष ध्यान नहीं दिया, लेकिन भाजपा को अकसर यह दावा करते हुए देखा गया है कि उन्हें इस बार पर्याप्त दलित वोट मिलेगा। वहीं कांग्रेस भी लगातार दलित वोटों के फायदे का दावा करती रही है। अब ऐसे में 11 फरवरी को नतीजे ही बता सकते हैं कि बसपा का दिल्ली के चुनावी मैदान में उतरना कितना असरदार रहा।