1952 की बात है। इस चुनाव में कांग्रेस के चौधरी ब्रह्मप्रकाश तो वर्ष 1993 के चुनाव में भाजपा के मदन लाल खुराना अभी तक जनता के बीच चर्चाओं में हैं। वर्ष 1993 में 49 विधायकों के साथ भाजपा सरकार बनी थी। हालांकि भाजपा सरकार के इस पंचवर्षीय कार्यकाल में दिल्ली वालों ने तीन मुख्यमंत्रियों को देखा, जोकि आज तक ऐसा नहीं हुआ है।
ठीक इसी तरह साल 1998 में दिल्ली का जब विधानसभा चुनाव हुआ तो कांग्रेस और भाजपा दोनों के ही नेता दिल्लीवालों में आज तक चर्चित हैं। ये चेहरे थे कांग्रेस की शीला दीक्षित और भाजपा की सुषमा स्वराज। इससे पहले और अब तक दिल्ली में कभी भी दो महिलाओं की टक्कर के बीच चुनाव नहीं लड़ा गया। हालांकि ये वही चुनाव है जिसमें दिल्ली वालों ने सबसे ज्यादा अपने वोट के अधिकार का इस्तेमाल कम किया था।
साल 2003 और 2008 के विधानसभा चुनाव की बात करें तो इसने भी नेता जी के मुखड़े पर ही चुनाव हुआ। तब तक शीला दीक्षित भी जनता के बीच चर्चित थीं। भाजपा की ओर से ये दोनों ही चुनाव वरिष्ठ नेता विजय कुमार मल्होत्रा के फेस पर लड़ा। इसी का असर था दोनों चुनाव में भले ही भाजपा को हार का सामना करना पड़ा हो, लेकिन वर्ष 2003 में पांच और 2008 में तीन सीटें बढ़ा ली थीं।
पांच विधानसभा चुनाव के बाद दिल्ली जब वर्ष 2013 में छठा विधानसभा चुनाव हुआ तो कांग्रेस और भाजपा के अलावा तीसरा चेहरा जनता के बीच था, आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल। इस चुनाव में भाजपा ने फिर से अपने नेता जी का चेहरा बदला। भाजपा की ओर से डॉ. हर्षवर्धन, कांग्रेस की ओर से शीला दीक्षित और आम आदमी पार्टी की ओर से अरविंद केजरीवाल का चेहरा जनता के सामने था। चूंकि इसी चुनाव के वक्त देश में सिस्टम सुधार की मांग जोरों पर थी, इसका असर चुनाव पर दिखा और भाजपा को सर्वाधिक 33 फीसदी वोट मिले थे। जबकि कांग्रेस को 24.6 और आम आदमी पार्टी को 29.5 फीसदी वोट ही मिले। हालांकि बहुमत हासिल न कर पाने के चलते आप-कांग्रेस के बीच गठबंधन हुआ और दिल्ली में 49 दिन की सरकार बनी जोकि इससे पहले कभी नहीं देखने को मिला।
दिल्ली के सातवें विधानसभा चुनाव-2015 में भी नेता जी के मुखड़े का फैक्टर ही सबसे ज्यादा चला और ऐतिहासिक परिणाम भी आए। इस चुनाव में पहली बार किसी एक राजनैतिक पार्टी को 50 फीसदी से भी ज्यादा 54.3 फीसदी वोट पड़ा और 67 विधायकों के साथ दिल्ली की सत्ता को संभाला। इस चुनाव में भी भाजपा ने अपने नेता जी का मुखड़ा बदला था और डॉ. हर्षवर्धन की जगह किरण बेदी को चुनाव मैदान में सबसे आगे रखा था जबकि कांग्रेस की ओर से शीला दीक्षित और अजय माकन के रूप में दो बड़े चेहरे जनता के बीच थे।
दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा ने हर बार नए नेता को मैदान में उतारा, लेकिन परिणाम आने के बाद पार्टी में नेता का कद छोटा नहीं हुआ, बल्कि उन्हें और आगे मौके मिले। सुषमा स्वराज, विजय कुमार मल्होत्रा, डॉ. हर्षवर्धन संसद तक पहुंचे। जबकि किरण बेदी को राज्यपाल बनाया गया।
. 1952 से 2015 के बीच दिल्ली में 7 बार हो चुके हैं विधानसभा चुनाव।
. भाजपा की ओर से अब तक पांच बार बदले जा चुके हैं मुख्यनेता।
. कांग्रेस भी दो बार बदल चुकी है नेता जी के चेहरे।
. दिल्ली के लगातार पांच चुनाव में शीला दीक्षित रहीं कांग्रेस का चेहरा।
. भाजपा के विजय कुमार मल्होत्रा और आप पार्टी से अरविंद केजरीवाल दो-दो बार कर रह चुके हैं चुनावी चेहरे।
. जब-जब भाजपा ने बदले चेहरे, परिणाम के बाद नेता जी को मिला बड़ा स्थान।