दिल्ली के अस्पतालों में उपचार कराने वाले थैलेसीमिया मरीजों को सरकार ने बड़ी राहत दी है। इन मरीजों को सरकारी अस्पताल और डिस्पेंसरी में समय रहते उपचार उपलब्ध कराने के लिए निगरानी बढ़ा दी गई है। दिल्ली स्वास्थ्य विभाग ने अस्पतालों और डिस्पेंसरी में तैनात कर्मचारियों के लिए एक फॉर्मेट तैयार किया है। इसमें मौजूदा सवालों के जवाब हर माह की 7 तारीख तक विभाग को भेजना अनिवार्य है।
इस फार्मेट में मरीज की जानकारी के अलावा, थैलेसीमिया माइनर की जांच कैसे होगी? जांच में रोग की पुष्टि होती है तो उसे आगे कैसे भेजा जाएगा? इत्यादि से जुड़े सवाल मौजूद हैं। बताया जा रहा है कि इस नई प्रक्रिया के तहत कई तरह के फायदे आने वाले दिनों में देखने को मिल सकते हैं।
अभी तक दिल्ली में थैलेसीमिया मेजर से प्रभावित मरीजों का सही आंकड़ा नहीं है। इसलिए विभाग ने डिस्पेंसरी और अस्पतालों से आ रहे फॉर्मेट के आधार पर मरीजों की रजिस्टर बनाना भी शुरू कर दिया है। दिल्ली सरकार की ओर से कुंडली से पहले थैलेसीमिया की जांच नाम से अभियान भी चलाया है।
दो प्रकार की होती है बीमारी
स्वास्थ्य विभाग के अतिरिक्त निदेशक डॉ. एसके अरोड़ा ने बताया कि थैलेसीमिया दो तरह का होता है मेजर व माइनर। आमतौर पर स्क्रीनिंग के दौरान थैलेसीमिया माइनर मिलने पर उसकी पुष्टि के लिए मरीज के सैंपल को बड़े अस्पताल भेजे जाते हैं। थैलेसीमिया मेजर ग्रस्त होने पर मरीज को ब्लड ट्रांसफ्यूजन की आवश्यकता पड़ती है। उन्होंने बताया कि दिल्ली में इस समय करीब ढाई हजार थैलेसीमिया मेजर ग्रस्त हैं। जबकि राजधानी की कुल आबादी का करीब साढ़े पांच फीसदी हिस्सा थैलेसीमिया माइनर से पीड़ित है।
दसवीं की मार्कशीट पर लिखा हो थैलेसीमिया माइनर
दिल्ली स्वास्थ्य विभाग ने शिक्षा निदेशालय को एक प्रस्ताव भी भेजा है। इसमें लिखा है कि दसवीं कक्षा के विद्यार्थियों की मार्कशीट के पीछे थैलेसीमिया माइनर लिखना चाहिए। साथ ही ये भी लिखना चाहिए कि ये एक रोग नहीं है। ऐसा करने से उक्त विद्यार्थी को हमेशा अपने थैलेसीमिया माइनर होने की जानकारी रहेगी।