इन बच्चों का हाल तो बहुतों ने पूछा, मदद किसी ने न की
लॉकडाउन के दौरान इस इलाके में अभी तक इन छोटे-छोटे बच्चों को कहीं से कोई मदद नहीं मिली है। दिल्ली कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स के एक प्रतिनिधि का फोन आया था। उन्होंने कुछ जानकारियां मांगी थी, हमने दे दी। वहां से कुछ उम्मीद बंधी थी, मगर अभी तक मदद के नाम पर एक रोटी तक नहीं मिली।
दिल्ली महिला आयोग ने भी यहां का हालचाल पूछा। मैं बताना चाहूंगी कि केवल हालचाल लिया, बच्चों को किसी तरह की कोई मदद नहीं दी गई। दिल्ली सरकार के एक प्रतिनिधि ने भी बातचीत की थी। उनका कहना था कि वे मदद करेंगे। कोठों पर रहने वाली महिलाओं को भी मदद देंगे।
सरकारी प्रतिनिधि बोले, हमें उन महिलाओं के राशन कार्ड आदि दस्तावेज दे दें। यह बात बहुत परेशान करने वाली थी। ललिता सवाल करती हैं, आज कितने दिन हो गए हैं लॉकडाउन को लागू हुए, यहां न तो एक पैसे की मदद और न ही रोटी पहुंच सकी है।
केवल आश्वासन मिल रहे हैं; इतने दशकों से यह स्कूल चल रहा है तो आगे भी चलेगा। बच्चों को रोजाना की तरह पांच बार खाने को दिया जाता है।
मां के साथ मोबाइल पर बात कराते हैं बच्चों की बात
कोठों पर रहने वाली सेक्स वर्कर अब खाली हैं। वे स्कूल से चंद कदमों की दूरी पर रहती हैं। उनका मन करता है अपने बच्चों से मिलने का, लेकिन कोरोना के संक्रमण की वजह से उन्हें मिलने नहीं दिया जाता।
एसपीआईडी-एसएमएस सेंटर की उपाध्यक्ष के अनुसार, अभी हम किसी को यहां आने की इजाजत नहीं दे रहे हैं। अगर कोई छोटा बच्चा है तो एक निर्धारित दूरी पर खड़ी होकर मां अपने बच्चे से बात कर सकती है। बच्चों की मोबाइल पर बात कराई जाती है।
अभी यहां किसी नए बच्चे को नहीं लिया जा रहा। कई महिलाएं आई हैं अपने बच्चों को छोड़ने, लेकिन उन्हें कहा गया है कि इन बच्चों के स्वास्थ्य की खातिर हम जोखिम नहीं उठा सकते। कोरोना से पैदा हुई स्थिति सामान्य होने के बाद ही नए बच्चे को प्रवेश मिलेगा।