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कोरोना ने ठप की रेहड़ी-पटरी वालों की जिंदगी, साप्ताहिक बाजार बंद होने से पड़े खाने के लाले!

Thu, 13 Aug 2020 05:45 PM IST
Harendra Chaudhary शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • रेहड़ी-पटरी वालों ने बयां किया अपना दर्द
  • सोम, मंगल,बुध बाजार से चलता था घर
  • बाहर के खाने से लोग अभी भी कर रहे हैं परहेज
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साप्ताहिक बाजार - फोटो : अमर उजाला (फाइल)
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विस्तार
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संजय शर्मा उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले से आए और दिल्ली में बस गए हैं। हेयर ड्रेसिंग में शर्मा अपने बेटे के साथ लगे हैं, वहीं बहू और पत्नी का ब्यूटी पार्लर है, लेकिन मार्च 2020 के बाद से घर का खर्च बमुश्किल निकल पा रहा है। न तो दुकान का किराया दे पा रहे हैं और न ही को-ऑपरेटिव बैंक की किस्तें और न ही कमेटी के पैसे। राधे श्याम, शमीम, मुश्ताक और सोनू का भी यही हाल है। मार्च के पहले सब ठीक था। अब सैलून खोलकर बैठे रहते हैं और दिन भर में दो-तीन ग्राहक ही आ रहे हैं। बमुश्किल दाल-रोटी चल रही है।

सैलून पड़े हैं खाली

कोविड-19 ने मध्य, निम्न वर्ग का जीवन बदल दिया है। सुनील कुमार सब्जी बेचते हैं। नाई की दुकान पर जाने पर कोविड-19 के संक्रमण का खतरा उनके दिलो दिमाग में बैठ गया है। लिहाजा वह एक 10 रुपये का रेजर लेकर अपना दो बार सिर गंजा कर चुके हैं। राधे श्याम कहते हैं कि यह सामान्य चलन हो गया है।

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वाणिज्य मंत्रालय से रिटायर हुए एके शर्मा के बेटे ने भी अब ट्रिमर से बाल बनाना सीख लिया है। वह घर पर ही शेविंग कर लेते हैं और दो नंबर पर सेट करके बाल भी काट लेते हैं। एके शर्मा के दोनों बेटे विनोद और अनुज रेस्टोरेंट चलाते हैं। मार्च 2020 तक दोनों का धंधा खूब अच्छा चल रहा था, लेकिन अब विनोद और अनुज दोनों के रेस्टोरेंट में सन्नाटा पसरा रहता है।

सोम, मंगल, बुद्ध बाजारों ने किया बेड़ा गर्क

दिल्ली के मंडावली इलाके में साप्ताहिक बाजार लगाने वालों की अच्छी खासी संख्या है। ये लोग सोम, मंगल, बुधवार को पूर्वी दिल्ली में लगने वाले साप्ताहिक बाजारों से परिवार का खर्चा चलाते थे। लेकिन मार्च 2020 से ये बाजार भी नहीं लग रहे हैं। खेमचंद का कहना है कि इन्हीं बाजारों के सहारे उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ाया, 40 गज में छोटा सा मकान बनाया।

इसके दो फ्लोर किराए पर दिए. लेकिन किराएदार भी कामकाज ठप होने के कारण किराया नहीं दे पा रहे हैं। ऐसे में जिंदगी बहुत दूभर हो गई है। खेमचंद के अनुसार वह और उनकी पत्नी दोनों सब्जी बेचकर किसी तरह गुजारा कर रहे हैं।

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सोमपाल ड्राइवर हैं। कार चलाते हैं। कोविड-19 के संक्रमण में उनकी नौकरी चली गई है। नई नौकरी के लाले पड़े हैं। सियाराम की स्थिति भी मुश्किल भरी है। उनके पास सामान ढोने वाला आटो है। सियाराम का कहना है कि गाजीपर मंडी, दरियागंज, चांदनी चौक, सदर बाजार, कीर्ति नगर की फर्नीचर मार्केट से सामान लाना और ले जाना यह सब कमाई का जरिया था। बाजार खुले हैं, लेकिन ग्राहक नहीं आते। आटो की किस्त देना भी भारी पड़ रहा है।

यादव जी के मशहूर छोले कुल्चे

ठेले पर चमकदार बोर्ड लगा है। बोर्ड को स्क्रू से खोलकर अलग रख दिया है। शांतनु यादव इस समय सीजन में आम बेच रहे हैं। बताते हैं रेहड़ी पर बना खाना लोग खाना कम खा रहे हैं। अब मजदूर, रिक्शा वाले भी खाने से परहेज करने लगे हैं। इसलिए एक महीने बाद 15 जुलाई से वह फिर फल-सब्जी बेचने में लग गए हैं।

शांतनु का कहना है कि पहले वह सुबह से लंच के समय तक इस ठेले पर पराठा, रायता, छोले-कुल्चे बेचते थे। शाम को इसे यादव चाट भंडार का रूप दे देते थे। बेटा मोमोज, पकौड़े, राम लड्डू बेचने में लग जाता था। शांतनु बताते हैं फिलहाल बेटा राम लड्डू, पकौड़े बेचना शुरू कर चुका है, लेकिन ग्राहक अभी बाहर का कुछ खाने-पीने से बहुत डर रहे हैं।

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