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जो बना 3 सरकारों के लिए सिर दर्द उसे मिला 'एशिया का नोबेल'

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संजीव चतुर्वेदी जिन्हें 2015 के रेमन मैग्सेसे पुरस्कार देने की घोषणा की गई है वो, मोतीलाल नेहरू नेशनल इंस्टीट्यूट से 1995 बैच के इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के छात्र रहे हैं। साथ ही 2002 बैच के इंडियन फॉरेस्ट सर्विस (आईएफएस) के अफसर हैं।
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आईएफएस की ट्रेनिंग के दौरान अपने बेहतरीन प्रदर्शन के लिए दो मेडल जीतने वाले संजीव चतुर्वेदी का विवादों से गहरा नाता रहा है। अपनी पहली पोस्टिंग से ही तबादले का दंश झेलने वाले चतुर्वेदी ने इन सबके बावजूद आज तक हार नहीं मानी है।

कहने वाले तो ये भी कहते हैं कि वर्तमान में चतुर्वेदी को अपने ईमानदारी की कीमत शुरू से ही चुकानी पड़ी है। संजीव के जीवन जुड़े कुछ खास विवादों को हम यहां आपको बता रहे हैं।
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भ्रष्टाचार उजागर किया तो कर दिया तबादला

संजीव की पहली पोस्टिंग कुरूक्षेत्र में हुई थी जहां उन्होंने पदभार संभालते ही हंसी बुताना कैनाल के निर्माण में हुई धांधली को लेकर ठेकेदारों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी।

जिसके बाद संजीव को ‌मुख्य सचिव (वन) ने उनसे जवाब तलब किया और उनकी पोस्टिंग फतेहाबाद कर दी। इसके बाद 2007 में संजीव को अवज्ञा के लिए सस्पेंड कर दिया गया था।

संजीव के सस्पेंड होने के तुरंत बाद उनकी जमा की गई रिपोर्ट की बिनाह पर हरियाणा वन विभाग ने उन ठेकेदारों पर मामला दर्ज कर कार्रवाई शुरू कर दी। जब दिल्ली की एक एनजीओ ने इन ठेकेदारों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई तो हरियाणा सरकार ने उन्हें बचाने की भी कोशिश की।

विधायक की खुली पोल तो दर्ज हुआ FIR

संजीव ने हरियाणा के एक विधायक प्रहलाद सिंह पर भी करदाताओं के पैसों से अपने निजी बगीचों के लिए दुर्लभ पेड़ों को खरीदने का आरोप लगाया था।

2007-08 में संजीव ने एक हर्बल पार्क की स्थापना में भी भ्रष्टाचार व्याप्त होने का आरोप लगाया था। इस घोटाले में एक विधायक और कई नौकरशाहों लिप्त थे। इसके साथ ही उन्होंने हिसार और झज्जर के पौधारोपण परियोजना में भी अनियमितता होने की बात का खुलासा किया था।

इसी कारण संजीव पर कई आपराधिक मामले दर्ज कर दिए गए थे। उनके समर्थकों के अनुसार ये सभी मामले झूठे एफआईआर पर आधारित थे।

परिवार भी लगा चुका है संजीव पर आरोप

चतुर्वेदी ने सतर्तकता ब्यूरो द्वारा चलाई गई चार जांचों का भी सामना किया। हरियाणा में अफसर रहते हुए संजीव के 12 बार तबादले हुए।

यहां तक‌ कि चतुर्वेदी को परिवार की तरफ से लगाए गए आरोपों का सामना करना पड़ा। उनके ससुराल पक्ष ने उनपर दहेज मांगने का आरोप लगाया था और जिसके बाद उनका रिश्ता तलाक पर जाकर खत्म हुआ।

2009 में संजीव के खिलाफ झज्जर में फंड इस्तेमाल करने और नकली पौधारोपण करने का मामला दर्ज किया गया था। यह वही केस जिसमें ‌भ्रष्टाचार के चलते 9 अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया गया था।

हरियाणा सरकार की राष्ट्रपति से की थी शिकायत

जब हरियाणा सरकार के प्रताड़नाओं की हद हो गई तो परेशान होकर संजीव ने 2010 में केंद्र सरकार के अधीन डेप्यूटेशन की अर्जी डाली।

संजीव ने उस समय की राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को शोषण की शिकायत की। ‌इसके बाद राष्ट्रपति ने उनकी शिकायत कैबिनेट सचिवालय को भेज दी। कैबिनेट सचिवालय के निर्देशानुसार पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने 2010 में संजीव के केस पर अध्ययन करने के लिए दो सदस्यीय पैनल का गठन किया।

मंत्रालय ने अपनी जांच में चतुर्वेदी के आरोपों को सही पाते हुए उनका केस सीबीआई को रेफर किया। सीबीआई ने भी अपनी प्रारंभिक जांच में इस मामले को जांच योग्य ठहराया। इसके बाद मंत्रालय ने सीवीसी को केस सौंपते हुए सीबीआई जांच की सलाह दी।

राष्ट्रपति ने मानी संजीव की बात, की कार्रवाई

केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने अपनी जांच में ये भी पाया कि संजीव ने हरियाणा सरकार के खिलाफ जो शोषण का आरोप लगाया था वह सही था। 19 जनवरी 2011 में राष्ट्रपति ने संजीव के खिलाफ तैयार सभी चार्चशीट को समाप्त कर दिया।

हालांकि हरियाणा सरकार ने मंत्रालय की सभी रिपोर्ट्स को खारिज करते हुए नए सिरे से जांच करने की मांग की। हालांकि मंत्रालय ने सरकार की मांग ठुकरा दी।

बता दें‌ कि हरियाणा सरकार ने फिर भी संजीव को केंद्रीय डेप्यूटेशन पर जाने से रोक दिया लेकिन मई 2012 में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने राज्य सरकार के आदेश को रद्द कर दिया।

2008 से 2014 के बीच में राष्ट्रपति ने हरियाणा सरकार के आदेश को निरस्त करते हुए चतुर्वेदी के सपोर्ट में चार आदेश पास किए। केंद्र में डेप्यूटेशन पाने के तुरंत बाद चतुर्वेदी ने हरियाणा के मुख्यमंत्री, वन मंत्री समेत कई अधिकारियों पर आपराधिक मामले सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किए। जिसके बाद कोर्ट ने 2012 में इन सभी के खिलाफ सीबीआई जांच का नोटिस का जारी कर दिया।

एम्स में किया 'आउटस्टैंडिंग' काम

केंद्र में डेप्यूटेशन मिलने के बाद 29 जून 2012 में चतुर्वेदी को एम्स के डिप्टी डायरेक्टर बनाए गए। उन्हें एम्स के सीवीओ का अतिरिक्त भार भी सौंपा गया।

सीवीओ के पद पर रहते हुए संजीव ने एम्स के डॉक्टरों के गैरअधिकृत विदेश दौरे का मामला उजागर किया। उनके कार्यकाल के दौरान ही पुलिस ने 6 करोड़ की प्रतिबंधित दवाओं से भरी एक गाड़ी पकड़ी।

संजीव ने अपने कार्यकाल में एम्स में 200 भ्रष्टाचार के मामले उजागर किए जिसके लिए उन्हें तब के केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलामनबी आजाद ने अभूत्पूर्व काम का तमगा दिया था। जिनमें 78 मामलों में सजा, 87 में चार्जशीट दाखिल और 20 से भी ज्यादा केसों को सीबीआई को सौंपा गया था।
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भाजपा सरकार ने भी किया अत्याचार

2014 में उन्हें एम्स के सीवीओ पद से मुक्त कर दिया गया था। जिसके बाद 16 अगस्त को उन्होंने स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन को पद से हटाए जाने को लेकर पत्र लिखा।

उनका सपोर्ट एम्स के स्टाफ ने भी किया और प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर संजीव ने इस मामले में हस्तक्षेप करने को कहा। इस मामले में आप ने भी प्रदर्शन कर उनका सपोर्ट किया था।

एम्स के अधिकारी संजीव चतुर्वेदी आज भी भ्रष्टतंत्र विरोधी अपनी ईमानदारी की कीमत चुका रहे हैं। उन्हें एक तरह से साइडलाइन कर दिया गया है।

आरटीआई से पता चला है कि आंतरिक प्रताड़ना के शिकार चतुर्वेदी को न तो कहीं स्थानांतरित किया जा रहा है, न उनसे और कोई काम लिया जा रहा है। उनकी फाइल केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के पास जाकर अटक गई है। केजरीवाल के मांग करने के बाद भी संजीव को दिल्ली सरकार की डेप्यूटेशन नहीं दी जा रही है।
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