साल 2009 में हुए 15वीं लोकसभा के चुनाव में डॉ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करना कांग्रेस के लिए फायदे का सौदा रहा। परिसीमन के बाद सभी नई सीटों पर कांग्रेस ने जीत हासिल की।
भाजपा के सभी प्रत्याशी कांग्रेस उम्मीदवारों के सामने एक राउंड में भी नहीं टिके। दिल्ली के इतिहास में सभी सीटों पर किसी दल के उम्मीदवारों की ऐसी हार नहीं हुई थी।
वर्ष 2004 में केंद्र की सत्ता खोने वाली भाजपा को 2009 के आम चुनाव में भारी उम्मीदें थीं। भाजपा ने तीन पुराने और चार नए उम्मीदवारों को चुनावी दंगल में उतारा, जबकि कांग्रेस ने चार मौजूदा सांसद, एक राज्यसभा सांसद, एक विधायक और एक पूर्व विधायक को टिकट दिया।
मनमोहन की लहर ने सबका मन मोहा
कांग्रेस के विधायक और पूर्व विधायक को कमजोर प्रत्याशी माना जा रहा था, मगर डॉ. मनमोहन सिंह की लहर में वे भी भारी मतों से जीते।
इस चुनाव में भाजपा उम्मीदवार पूर्व केंद्रीय मंत्री विजय गोयल, पूर्व सांसद बीएल शर्मा प्रेम और चेतन चौहान के अलावा नगर निगम में उसके सबसे बड़े नेता विजेंद्र गुप्ता, पूर्व मंत्री प्रो. जगदीश मुखी, विधायक रमेश बिधूड़ी और पूर्व मेयर मीरा कांवरिया को करारी हार का सामना करना पड़ा।
प्रो. जगदीश मुखी की भाजपा ही नहीं, कांग्रेस भी जीत मान रही थी, क्योंकि उनके सामने महाबल मिश्रा को कमजोर उम्मीदवार कहा जा रहा था। यही नहीं, सभी सर्वे भी मुखी की जीत दिखा रहे थे, लेकिन वह सवा लाख से अधिक मतों से चुनाव हारे।