नई दिल्ली।
उत्तर-पूर्वी दिल्ली में खुले सीवर में गिरकर जान गंवाने वाले 10 साल के बच्चे के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रशासन की घोर लापरवाही पर सख्त टिप्पणी की है। अदालत ने साफ कहा कि सीवर के गड्ढे को खुला छोड़ना जैसी चूक सिर्फ प्रशासनिक असफलता नहीं, बल्कि जीवन के मौलिक अधिकार का सीधा उल्लंघन है। न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा की पीठ ने कहा कि यह दुखद घटना सरकारी मशीनरी की बुनियादी नाकामी को उजागर करती है। बच्चे की मौत के बाद भी अधिकारियों और एजेंसियों का रवैया उदासीन रहा। हर कोई एक-दूसरे पर दोष मढ़ने में लगा रहा, लेकिन सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसी ने नहीं ली। अदालत ने स्पष्ट किया कि संवैधानिक अदालतें ऐसे पीड़ित परिवारों की पीड़ा को नजरअंदाज नहीं कर सकतीं, जिन्होंने सरकारी लापरवाही के कारण अपना बच्चा खो दिया। दर्द, सदमा और आर्थिक तंगी को सिर्फ कानूनी समय-सीमा में नहीं बांधा जा सकता।
मुआवजे का आदेश : पीठ ने बच्चे के परिजनों को याचिका दायर करने की तारीख से नौ प्रतिशत ब्याज के साथ 16.92 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिल्ली सरकार और दिल्ली जल बोर्ड को दिया। अदालत ने कहा कि दोनों को यह राशि चुकानी होगी, हालांकि वे कानूनी रास्ते से अन्य एजेंसियों से रकम वसूल सकते हैं।
यह था मामला : 27 सितंबर 2014 को दिल्ली जल बोर्ड के इंटरसेप्टर सीवर प्रोजेक्ट के दौरान मोहम्मद नाजिम नाम के 10 वर्षीय बच्चे की एक खुले और असुरक्षित सीवर में गिरने से मौत हो गई थी। परिवार का आरोप था कि साइट पर पर्याप्त बैरिकेडिंग और चेतावनी संकेत नहीं लगाए गए थे। प्रोजेक्ट में दिल्ली जल बोर्ड मुख्य एजेंसी थी, जबकि इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड (ईआईएल) प्रोजेक्ट मैनेजमेंट कंसल्टेंट के रूप में काम कर रही थी। अदालत में सभी पक्ष एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते रहे।