हाईकोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि यौन शोषण के मामलों में दिल्ली पीड़िता मुआवजा योजना के तहत मात्र फीमेल चाइल्ड(बच्ची) को ही मुआवजा नहीं मिलेगा बल्कि मेल चाइल्ड (बच्चा) भी इस योजना में मुआवजे का हकदार है।
अदालत ने अपने फैसले में निचली अदालत द्वारा यौन शोषण के शिकार 13 वर्षीय बच्चे को मात्र पांच हजार रुपये मुआवजा प्रदान करने के निर्णय को गलत ठहराते हुए उसे तीन लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया है।
न्यायमूर्ति जीएस सिस्तानी व न्यायमूर्ति संगीता ढींगरा सहगल की खंडपीठ ने बाल यौन अपराध मामलों में पोक्सो एक्ट, दंड प्रक्रिया संहिता 357 आदि का हवाला देते हुए कहा कि इस मामले में मुआवजा तय करने में ट्रायल कोर्ट (बाल न्यायालय) ने गलत आकलन किया है।
ट्रायल कोर्ट ने यौन शोषण के पीड़ित बच्चे को मानव तस्करी, अपहरण, बाल शोषण मद से 50 हजार रुपये का मुआवजा प्रदान करने का निर्देश दिया था। खंडपीठ ने कहा कि दिल्ली पीड़ित मुआवजा स्कीम 2011 का गलत तरीके से आकलन किया गया है।
'अदालत को है मुआवजा तय करने का असीमित अधिकार'
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खंडपीठ ने बच्चे से यौन अपराध संरक्षण अधिनियम 2012 की धारा 33, पोक्सो एक्ट की धारा 7 व दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 357 (1) का हवाला देते हुए कहा कि पीड़ित या उसके आश्रितों को अपराध से हुए अपमान व चोट का नुकसान उठाना पड़ता है।
उनके पुनर्वास की जरूरत होती है। अदालत ने कहा कि धारा 33 की परिभाषा व्यापक है और अदालत को मुआवजा तय करने का असीमित अधिकार है।
अदालत ने कहा कि पोक्सो एक्ट व अन्य धाराओं में बाल यौन शोषण के पीड़ित के अधिकार व उसकी पहचान गुप्त रखने, उनको मुआवजा प्रदान करने इत्यादि का विस्तृत हवाला दिया गया है।
अदालत ने कहा कि इस मामले में पीड़िता की आयु घटना के समय मात्र 13 वर्ष थी और उसे उसी के स्कूल के चार नाबालिग छात्र स्कूल से बाहर जंगल में ले गए और यौन शोषण किया।
जानिए क्या है पूरा मामला
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पीड़ित बच्चा महरौली इलाके में एक सरकारी स्कूल में कक्षा नौ का छात्र था। अक्तूबर-13 को उसी के स्कूल के चार अन्य छात्र स्कूल के पीछे जंगल में ले गए और यौन शोषण किया गया।
डर के कारण बच्चे ने तीन दिन बाद घर में इस घटना के बारे में बताया व पुलिस ने इस मामले में चार नाबालिगों के खिलाफ मारपीट, अप्राकृतिक कृत्य, अपहरण व षडयंत्र का मामला दर्ज किया था।
आरोपी चारों बच्चें भी उन्हीं की कॉलोनी में रहते थे। उनसे तंग आकर बच्चे के माता पिता ने घर बदल लिया व उसका स्कूल भी बदलवा दिया। याची के अधिवक्ता ने हाईकोर्ट में तर्क रखा था कि बाल अदालत ने मानव तस्करी-बाल शोषण, अपहरण मद में से पीड़ित बच्चे को 50 हजार रुपये का मुआवजा तय किया था जो मनमाना, भेदभाव पूर्ण व मौलिक अधिकारों का हनन है।