महिलाओं को मिली बड़ी राहत
बिहार, झारखंड, ओडिशा सहित देश के अन्य राज्यों से एम्स में रेडिएशन थेरेपी लेने के लिए महिलाओं को कई दिनों के लिए घरों से बाहर रहना पड़ता है। इनमें से कई महिलाएं काफी गरीब परिवार से होती है जो थेरेपी के लिए दो से तीन माह तक सड़कों पर जीवन यापन करती है। ऐसी महिलाओं को रेडिएशन थेरेपी के नई तरीके से एक दिन में ही सुविधा मिल गई और परिणाम भी पहले की तरह ही रहे।
बड़े स्तर पर किया जाएगा अध्ययन
रेडिएशन थेरेपी के असर को व्यापक स्तर पर जांचने के लिए एम्स दुनियाभर के संस्थानों के साथ व्यापक स्तर पर अध्ययन करेगा। इस अध्ययन में एक हजार से अधिक महिलाओं को शामिल किया जा सकता है। डॉक्टरों का कहना है कि पायलट प्रोजेक्ट के तहत किए गए अध्ययन के परिणाम काफी बेहतर है और पूरी दुनिया को इस दिशा में सोचने को तैयार कर रही है।
यहां होते हैं साइड इफेक्ट्स
बच्चेदानी के मुंह के कैंसर में रेडिएशन थेरेपी देने के बाद कई बार महिलाओं को पेशाब व शौच के रास्ते में साइड इफेक्ट्स दिखने लगते हैं। लेकिन अध्ययन के दौरान महिलाओं में ऐसे कोई लक्षण देखने को नहीं मिले।
एम्स में रोजाना होते हैं 5-6 मरीजों का उपचार
एम्स में रोजाना ब्रैकीथेरेपी की मदद से पांच-छह मरीजों को रेडिएशन थेरेपी दी जाती है। डॉक्टरों का कहना है कि इसकी मदद से कैंसर का उपचार रेडिएशन देकर ही किया जा सकता है। ब्रैकीथेरेपी की की मदद से ओरल कैंसर सहित अन्य का उपचार एम्स में हो रहा है। इस विधि में मरीज को बेहोस करके उक्त जगह पर सीधे हैवी रेडिएशन दिया जाता है। वहीं दूसरी लिनाक के माध्यम से रोजाना करीब 300 मरीजों का उपचार हो रहा है।