नोएडा में मरीज के पेट में कॉटन छोड़ने की जांच चल ही रही थी कि फोर्टिस अस्पताल पर दो और आरोप लग गए हैं। एक मामले में समय पर पूरे रुपये जमा न करवाने के चलते मरीज की मौत का आरोप परिजनों ने लगाया है।
जबकि दूसरे मामले में पूरे पैसे वसूलने के बाद ही परिजनों को शव ले जाने दिया। परिजनों की शिकायत पर डीएम ने जांच कमेटी गठित कर दी है।
इंदिरापुरम कॉलोनी, परतापुर मेरठ निवासी देवेंद्री देवी का बेटा सुमित (25वर्ष) मेरठ में 10 जून 2013 को सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गया था। स्थानीय डॉक्टर ने नोएडा के फोर्टिस अस्पताल में रेफर कर दिया था।
डॉक्टरों की बेपरवाही ने ली जान!
उनका कहना है कि रात करीब 12 बजे वह उसे इस अस्पताल लेकर आए थे, जहां इलाज के लिए दो किस्तों में करीब डेढ़ लाख रुपये जमा कर दिए थे। आरोप है कि 11 घंटे बीत जाने के बाद भी सुमित का ऑपरेशन शुरू नहीं किया गया और तीन लाख 19 हजार रुपये जमा करने के लिए कहा गया।
रुपये जमा करने में देरी के कारण मरीज को अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया और एंबुलेंस भी नहीं दी गई। परिजन मरीज को पहले एम्स और फिर एलएनजेपी लेकर गए थे। एलएनजेपी अस्पताल में 29 जून को सुमित ने दम तोड़ दिया।
देवेंद्री देवी का आरोप है कि डॉक्टर यदि समय रहते ऑपरेशन कर देते, तो उनके बेटे की जान बच जाती।
'तीन लाख दो तभी मिलेगी लाश'
दूसरी तरफ नेहरू गार्डन खोड़ा निवासी सुरेंद्र प्रताप सिंह ने अपने भाई धीरेंद्र (निवासी कैथोली, वाराणसी) को एक दिसंबर 2013 को फोर्टिस में बीमार हालत में भर्ती कराया था। उनका कहना है कि इलाज के लिए एक लाख 70 हजार रुपये जमा किए थे।
आरोप है कि धीरेंद्र का दो बार ऑपरेशन किया गया। दूसरे ऑपरेशन में उसकी मौत हो गई। अस्पताल ने शव नहीं दिया और तीन लाख 35 हजार 161 रुपये की मांग की। अगले दिन उतने ही रुपये के चेक और मृतक के नाम से जीवन बीमा की रसीद लेकर शव दिया गया।
इस मामले में फोर्टिस अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि सुमित सड़क दुर्घटना के चलते अस्पताल में भर्ती हुआ था। डॉक्टरों ने उसके दिमाग की सर्जरी की सलाह दी थी लेकिन ऑपरेशन की सफलता की पूरी संभावना नहीं जताई थी। ऐसे में परिजन खुद मरीज को डॉक्टर की इच्छा के विरुद्ध एम्स ले गए थे।
दूसरी तरफ धीरेंद्र प्रताप सिंह को अस्पताल की ओर से पूरा सहयोग दिया गया था। मामला कोर्ट में है इस कारण अस्पताल प्रशासन इस मामले में कोई टिप्पणी नहीं कर सकता।