निजी स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के अभिभावक हर वर्ष बढ़ती फीस के साथ बदलती ड्रेस और किताब से भी परेशान है। किताब और ड्रेस बदलकर हर वर्ष फीस के साथ अभिभावकों की जेब पर अतिरिक्त बोझ डाला जा रहा है।
इसके खिलाफ अब अभिभावक मुखर होने लगे हैं। उन्होंने स्कूलों के साथ शिक्षा विभाग से भी इस बाबत ठोस कदम उठाने की अपील की है। वहीं मामले को कोर्ट में ले जाने की तैयारी की जा रही है।
निजी स्कूलों की मनमानी के आगे अभिभावक बेबस नजर आते हैं। आलम यह है कि स्कूल प्रबंधक पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट और सीबीएसई के आदेश को भी नहीं मान रहे हैं।
स्कूलों में किताबों की प्राइवेट पब्लिकेशन की किताबों की रोक के आदेश की अनदेखी कर हर वर्ष किताबें बदल दी जा रही है। व्यावसायिक गतिविधियों पर रोक के बावजूद किताबों की दुकान खोलकर अभिभावकों की जेब ढीली कराई जा रही है। स्कूलों के आगे हरियाणा शिक्षा विभाग और सीबीएसई (केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड) भी मौन है।
बता दें कि कई बार सीबीएसई और कोर्ट ने सभी कक्षाओं में एनसीईआरटी की किताबें लागू करने का निर्देश दिया है। इसके बावजूद इस पर अब तक कोई अमल नहीं हुआ है। शहर के सभी बड़े निजी स्कूल खुद ही बुक सेट बेच रहे हैं तो कुछ स्कूलों ने दुकानों से साथ सांठगांठ कर रखी है।
प्राइवेट पब्लिकेशन से कमाते मोटा मुनाफा
शहर के निजी स्कूल प्राइवेट प्रकाशकों की किताबें लगवाकर मोटा कमीशन वसूल रहे हैं। एनसीईआरटी की छठवीं से आठवीं क्लास का बुक सेट 500 से 700 रुपये में आसानी से मिल जाता है, लेकिन प्राइवेट प्रकाशकों की किताबों का सेट पांच से छह हजार में आता है।
सेक्टर-12 स्थित एक निजी स्कूल में पांचवीं कक्षा की किताबों का सेट 4246 रुपये में खरीदना पड़ रहा है। शहर के कॉन्वेंट स्कूल भी अपनी मर्जी से किताबों का चयन करते हैं। एंट्री लेवल की किताबों का सेट दो हजार में मिल रहा है।
स्कूल अधिक कमीशन वाले को देते है तवज्जो
नए सत्र आने से पहले ही किताबों के बदलने के लिए स्कूलों में पूरी कहानी लिखी जाती है। स्कूलों द्वारा कमेटी बनाई जाती है। सत्र शुरू होने से पहले ही प्रकाशकों की लाइन स्कूलों में लगनी शुरू हो जाती है। कमेटी अलग-अलग प्रकाशकों की किताबें जांचती है।
इस बारे में पीटीएम में अभिभावकों की जानकारी दी जाती है। उन्हें कहा जाता है कि शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव हो रहा है। नई चीजें किताबों में जुड़ रही है।
छात्रों को अपडेट करने के लिए जरूरी है कि उन्हें नई जानकारी दी जाए। नई किताबें पढ़ाई जाए। अभिभावकों का कहना है कि जो प्रकाशक अधिक कमीशन या गिफ्ट देने के लिए राजी होते हैं, उनकी किताबें स्कूल में लगा दी जाती हैं।
धीरे-धीरे बदली जाती है ड्रेस
ड्रेस के बदलाव को लेकर होने वाले हंगामे को ध्यान में रखते हुए स्कूल बड़ी चालाकी से ड्रेस बदल रहे हैं। सत्र शुरू होने के बाद एक-एक कर ड्रेस बदली जाती है।
समर और विंटर के नाम पर अलग ड्रेस कोड लागू किया जाता है और फिर एक ड्रेस कोड के खत्म होने के बाद दूसरे ड्रेस कोड में कोई एक हिस्सा बदल दिया जाता है। इस तरह वर्ष के अंत तक पूरा ड्रेस ही तब्दील हो जाता है।
सीधे स्कूल से करते हैं संपर्क
किताब और ड्रेस बिक्री के लिए दुकान संचालकों से संपर्क न कर सीधे निजी स्कूलों के संचालको से संपर्क किया जाता है। कमीशन के आधार पर ड्रेस व पुस्तकें लागू करने की सौदेबाजी की जाती है।
विक्रेता व प्रकाशक से डील फाइनल होने के बाद पुस्तकों को बाजार में किसी एक दुकान पर बिक्री के लिए रखवाया जाता है। जो दुकानदार उन पुस्तकों को बेचता है उसे भी 10 फीसदी तक का कमीशन मिलता है।
छात्रों और अभिभावकों को किताब खरीदने के लिए बाजार में भटकना न पड़े। एक ही जगह पर सभी चीजें आसानी से उपलब्ध हो जाएं, इसके लिए दुकानदारों को अलॉट किया जाता है। इसमें सीधे स्कूलों का कोई रोल नहीं होता है। हर साल प्रकाशक किताबों को अपडेट करते है। नई चीजें जोड़ते हैं। ऐसे में पुरानी किताबें आउटडेटेड हो जाती है। -यशपाल यादव, अध्यक्ष, हरियाणा शिक्षण संगठन
स्कूलों ने लूट के कई रास्ते अपना लिए हैं। इनसे अभिभावकों की जेबें ढीली कराई जाती है। किताबों को लेकर अधिक खर्च कराया जा रहा है। एनसीईआरटी की किताबों को तवज्जो नहीं दी जाती है। इसके खिलाफ पिछले वर्ष सीबीएसई से आदेश जारी किया था, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। अब इस मामले को कोर्ट में ले जाने की तैयारी है।-रामफल श्योराण, महासचिव, अभिभावक एकता मंच