दिल्ली में मोदी के रथ को कौन खींचेगा इसे लेकर भाजपा अभी असमंजस में है। भाजपा के तरकश में ऐसे तीर की कमी हो गई है जो अचूक निशाना लगा सके।
यही वजह है कि पहले चरण में चुनाव होने के बावजूद भाजपा की राष्ट्रीय चुनाव समिति भी महज सात सीट पर अपना फैसला सुनाने से कतरा रही है।
प्रदेश भाजपा के पैनल में शामिल प्रत्याशियों के नाम पर राष्ट्रीय भाजपा सहमत नहीं है लिहाजा उन्हें शुक्रवार को री-काउंसिलिंग करने को कहा गया है।
सिद्धू ने फेरा सबकी उम्मीदों पर पानी
लोकसभा चुनाव के लिए दिल्ली में प्रत्याशियों का टोटा है। विधानसभा चुनाव के पहले तो लोकसभा प्रत्याशी के तो कई दावेदार थे, लेकिन यहां आम आदमी पार्टी के प्रभाव के कारण कोई भी धुरंधर लड़ने को तैयार नहीं हो रहा है।
पार्टी यह मान कर चल रही थी कि किरण बेदी, मनोज तिवारी, नवजोत सिंह सिद्धू मोदी के रथ को दिल्ली में आगे बढ़ाएंगे, लेकिन उनकी असहमति के कारण भाजपा की उलझन बढ़ गई है।
विधायकों को चुनाव में उतारा जाए या नहीं इसे लेकर भी भाजपा उलझन में है। कुछ विधायकों ने टिकट नहीं मिलता देख नाराजगी भी जता रहे हैं।
बीजेपी के विधायक करेंगे बगावत!
लोकसभा चुनाव का टिकट पाने के लिए विधायकों का तर्क है कि जब पार्षदों को लोकसभा की टिकट देने पर पार्टी विचार कर सकती है तो फिर विधायकों को चुनाव लड़ाने से क्यों गुरेज कर रही है।
सूत्रों का कहना है कि शुक्रवार को दिल्ली के चुनाव प्रभारी नितिन गडकरी के साथ प्रदेश संगठन प्रभारी प्रभात झा, संगठन मंत्री विजय शर्मा, प्रदेश अध्यक्ष डॉ. हषवर्धन री-काउंसलिंग के बैठेंगे। इस बैठक में एक बार फिर नए तरीके से पैनल तैयार किया जाएगा।
सभी सीटों के समीकरण को लेकर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से चर्चा के बाद एक रिपोर्ट तैयार कर पैनल में शामिल दावेदारों पर शनिवार को आयोजित राष्ट्रीय चुनाव समिति की बैठक में पेश किया जाएगा। जहां पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व सातों उम्मीदवारों के नाम पर अंतिम मुहर लगाएंगे।
केजरीवाल के खेमे में भी संकट
आम आदमी पार्टी के बड़े नेता लोकसभा चुनाव प्रचार के राष्ट्रीय अभियान पर हैं। वहीं, दिल्ली में पार्टी उम्मीदवारों को समर्पित कार्यकर्ताओं का टोटा पड़ गया है।
खासतौर से ऐसे इलाकों में, जहां पार्टी का विधायक नहीं है। आप प्रत्याशी ऐसे कार्यकर्ताओं की तलाश में जुटे हैं, जिनके सहारे उनके संसदीय क्षेत्र में प्रचार अभियान को धार दी जा सके।
दरअसल, पार्टी के गठन से पहले कार्यकर्ता आंदोलन की मुहिम में लगे थे। दो साल से चल रहे लंबे अभियान के बीच ही चुनाव प्रचार शुरू हो गया।
AAP को नहीं मिल रहा माहौल
पार्टी सूत्रों का कहना है कि संसदीय चुनाव में माहौल ऐसा नहीं है कि केंद्र में सरकार बनाने का दावा किया जाए। ऐसे में करीब दो साल से सड़क पर संघर्ष कर रहे कार्यकर्ताओं को जुटाने में दिक्कत आ रही है।
खासतौर से ऐसे इलाकों में, जहां पार्टी का विधायक नहीं है। इस बारे में पार्टी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने माना कि सड़क पर कार्यकर्ताओं की थोड़ी कमी है। हालांकि, उन्होंने कहा कि दिल्ली में प्रचार की ज्यादा जरूरत नहीं है।
दिल्ली में सरकार बनाने के बाद भी जनहित से जुड़े ढेरों फैसले लिए गए। ऐसे में दिल्लीवासियों को पार्टी के पक्ष में लामबंद करने की दिक्कत नहीं है।