प्रदेश भाजपा में यूं ही घमासान नहीं मचा है। संगठन की बागडोर संभालने वाले जहां सातों मोर्चों के अध्यक्ष टिकट पाने की दौड़ में पीछे छूट गए, वहीं 14 जिलाध्यक्षों में से एक को छोड़ सभी दरकिनार हुए।
लिहाजा ऊपरी तौर पर तो नहीं, लेकिन भीतर से बगावती तेवर अख्तियार किए हुए हैं। इसका उबाल प्रदेश कार्यालय पर दिख भी रहा है। यही नहीं, प्रदेश कार्यकारिणी के कई पदाधिकारियों का तो मोबाइल नंबर भी पहुंच से बाहर बता रहा है।
पार्टी ने टिकट के बंटवारे में मोर्चा अध्यक्षों की नहीं सुनी। युवा वर्ग के नाम पर पार्टी वोट मांग रही है, लेकिन युवाओं के नेतृत्व करने वालों को ही दरकिनार किया गया।
महिलाओं को तो पार्टी ने तरजीह दी है, लेकिन महिला मोर्चा के नेता दरकिनार हो गए। इसी तरह पूर्वांचल मोर्चा और अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्षों में से किसी को टिकट नहीं मिला है।
जिलाध्यक्षों को लगा दिया किनारे
यही नहीं जिस दलित समुदाय के वोटर को साधने में पूरी पार्टी जुटी हुई है, उसी दलित मोर्चा के टीम के हिस्से को दरकिनार कर दिया गया है। किसानों की बात करने वाली पार्टी ने इस मोर्चा से जुड़े नेताओं को भी तरजीह नहीं दी है।
और तो और, जिलाध्यक्षों को भी पार्टी ने किनारे लगा दिया है। चांदनी चौक जिलाध्यक्ष तो टिकट पाने में सफल रहे, लेकिन केशवपुरम, उत्तर-पश्चिम, बाहरी दिल्ली, पश्चिमी दिल्ली, नजफगढ़, महरौली, दक्षिणी दिल्ली, नई दिल्ली, करोल बाग, मयूर विहार, शाहदरा, नवीन शाहदरा और उत्तर-पूर्वी दिल्ली के जिलाध्यक्षों पीछे छूट गए है।
लिहाजा चुनाव में इनके संगठन के भितरघात से बचना भाजपा के लिए मुश्किल भरा हो सकता है। उधर, प्रदेश अध्यक्ष सतीश उपाध्याय और महामंत्री आशीष सूद भी टिकट की दौड़ में पीछे रह गए। ऐसे में पूरे संगठन को एक जुट कर चुनाव लड़ाना उनके लिए भी भारी पड़ रहा है। नामांकन के दौरान टीम के कई लोग पूरे मन से सहयोग करते नहीं दिख रहे हैं।