दंगे की आग में झुलसे अटाली गांव में चहलपहल तो शुरू हो गई है लेकिन माहौल अब भी कई जगह बोझिल सा माहौल बना हुआ है। शनिवार को बीएसएफ और हरियाणा पुलिस के जवान मुस्तैदी के साथ गांव में तैनात दिखे। बस अड्डे पर दुकानें खुली हुई थीं, जहां खरीदारी करते लोग भी दिखाई दिए। लेकिन कुछ ऐसे भी घर दिखे जहां सन्नाटा पसरा हुआ है।
बेशक दंगों के बाद अब हालात नियंत्रण में हैं लेकिन उस घटना के निशान हर तरफ दिखते हैं। गलियों को देखकर लगता है कि ये कभी तो गुलजार रही होंगी। घर के एक कोने में बैठे बुजुर्ग नूर मोहम्मद ने बातचीत के दौरान आग्रह किया कि पुराने दिनों की याद न दिलाएं अब हमारी पहचान इतनी भर है कि हम एक मजदूर हैं जिन्हें ग्रामीणों से काम मिलता है।
वे मजदूरी के भरोसे अपना पेट पालते हैं। उल्पत कहती हैं ‘मैंने हजारों बच्चों को अपने हाथ से मिड-डे मिल बनाकर खाना खिलाया। कभी धर्म के नाम पर बच्चों में फर्क नहीं देखा।
सेवानिवृत्त सैन्यकर्मी सूबेदार सौदान सिंह कहते हैं कि कुछ चुनावी महत्वाकांक्षी लोगों की वजह से आज भी गांव तनावग्रस्त है। जिन्हें राजनीति का क ख ग घ भी पता नहीं है उसे भी यह बात मालूम है कि गांव की राजनीति में धर्म और जाति का रोल क्या है। उन्होंने भगवान से ऐसे भगत सिंह के लिए दुआ मांगी जो गांव को शांत कर दें।
हरियाणा महिला कल्याण समिति की प्रदेशाध्यक्ष एवं समाजशास्त्री डॉ आलोकदीप सक्सेना गांव में शांति के लिए जल्द ही पौधरोपण अभियान चलाकर दोनों समुदाय के बीच वैमनस्य को खत्म करने के लिए प्रयासरत हैं। वे कहती हैं कि ईश्वर जानता है कि दोनों संप्रदायों के बेघर और उजड़े हुए लोगों को इस वक्त राहत, सांत्वना और उम्मीद की कितनी जरूरत है।
उन्होंने राजनीतिक दलों से राजनीति से ऊपर उठकर शांति की कोशिश करने की अपील करते हुए कहा कि यदि पक्ष-विपक्ष के लोग अटाली गांव में जाएं व शांति की अपील करें, तो उससे दोनों संप्रदायों के बीच जहरीला माहौल खत्म हो जाएगा।