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कंक्रीट के जंगल में बदल रही हरी-भरी अरावली, बेपरवाह है सरकार

Wed, 18 May 2016 01:31 AM IST
ओम प्रकाश/अमर उजाला, गुड़गांव

सार

  • बिल्डरों-नेताओं के गठजोड़ से खत्म हो रहा हरा-भरा क्षेत्र
  • गुड़गांव में इस समय मुश्किल से दो फीसदी फॉरेस्ट कवर बचा है
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गुड़गांव में अरावली के बीच बने कंक्रीट के जंगल - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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एक तरफ बढ़ते प्रदूषण को लेकर हाय तौबा मच रही है तो दूसरी ओर अनियोजित विकास की दौड़ में हरियाली की बलि दी जा रही है। जिस वन विभाग के पास पेड़-पौधों और खासतौर पर अरावली के संरक्षण की जिम्मेदारी है, वह बिल्डरों और अन्य निर्माण कार्यों के नाम पर इसे खोखला करने की एनओसी (अनापत्ति) जारी कर रहा है।
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पर्यावरणविदों का कहना है कि गुड़गांव में इस समय मुश्किल से दो फीसदी फॉरेस्ट कवर बचा है। अरावली की जमीन पर नजर गड़ाए बैठे नेताओं, बिल्डरों और नौकरशाहों की मंशा पूरी हुई तो दिल्ली एनसीआर का फेफड़ा कहे जाने वाला यह क्षेत्र कंक्रीट के जंगल में बदल जाएगा और फॉरेस्ट कवर एरिया एक फीसदी पर आ जाएगा।

पुल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. हिमांशु गर्ग कहते हैं कि इस समय जिले में करीब 30 फीसदी लोग सांस से संबंधित समस्याओं से पीड़ित हैं। लगातार घटते वन क्षेत्र की वजह से शुद्ध हवा कम हो रही है। गर्मी बढ़ रही है। बीमारियां बढ़ रही हैं। हम ये विकास आखिर किसके लिए कर रहे हैं।
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एक तरह से हम लोग भष्मासुर की भूमिका में आ गए हैं। हमने हरियाली नहीं बढ़ाई तो जीना मुहाल हो जाएगा। छलनी होती अरावली की दशा को लेकर न सिर्फ पर्यावरण से जुड़ी स्थानीय संस्थाएं परेशान हैं बल्कि अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संस्था ग्रीनपीस भी चिंतित है।

उसने अरावली को बचाने के लिए अपने ऑनलाइन प्लेटफार्म ग्रीनपीस एक्स पर इसके लिए एक कैंपेन भी चलाया हुआ है। अभियान चलाने वाले दीप्स बरुआ कहते हैं कि हरियाणा सरकार बिल्डरों के हाथों खेल रही है। अरावली का संरक्षण आने वाली पीढ़ियों के लिए बहुत जरूरी है।
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अरावली में हो रहा खनन - फोटो : अमर उजाला
सेव अरावली से जुड़े पर्यावरण प्रहरी जितेंद्र भड़ाना कहते हैं कि आज इंसान तरक्की के लिए अपने ही शहर को श्मशान बनाने पर तुला हुआ है। राज्य सरकार दिल्ली-एनसीआर के फेफड़े का नाश करने वाले फैसले ले रही है। कभी इसे वन क्षेत्र मानने से इनकार कर देती है तो कभी बिल्डरों को लाइसेंस दे देती है।

अरावली के संरक्षण के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे कर्नल सर्वदमन सिंह ओबेराय के मुताबिक हुड्डा सरकार के दौरान पूरी अरावली में कम से कम डेढ़ सौ बिल्डरों को लाइसेंस दिए गए। उनके निर्माण बंद होने चाहिए। देखते ही देखते अरावली में सैकड़ों बिल्डिंगें खड़ी हो गई हैं। हरे भरे जंगल को कंक्रीट का जंगल बना डाला गया है।

चौंकाने वाले तथ्य:
गुड़गांव का कुल ट्री कवर एरिया 3.5 जबकि फारेस्ट कवर एरिया सिर्फ 2 फीसदी बचा है। बेहिसाब कंस्ट्रक्शन का यही हाल रहा तो इसे एक फीसदी होने में देर नहीं लगेगी। 
देश का दूसरा सबसे कम वन क्षेत्र वाला राज्य हरियाणा है। यहां सिर्फ 3.59 फीसदी वन क्षेत्र है, जबकि इको सिस्टम के हिसाब से 33 फीसदी भूक्षेत्र वन होना चाहिए। यहां जो 3.59 फीसदी वन क्षेत्र है, उसमें भी बड़ा योगदान अरावली का है।
अरावली में करीब तीन सौ प्रजाति की स्थानीय वनस्पतियां हैं, जबकि स्वदेशी पक्षियों की 120 प्रजातियां हैं।    पर्यावरणविद् विवेक कंबोज के सवाल:
1-सेंट्रल ग्राउंड वाटर अथॉरिटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि अरावली क्रिटिकल वाटर रिचार्ज जोन है। इससे गुड़गांव, फरीदाबाद और दिल्ली के लिए पानी रिचार्ज होता है। इसके बाद भी इसमें निर्माण की इजाजत कैसे दी जा रही है। 
2-अरावली वन क्षेत्र है, यह दिल्ली-एनसीआर के लिए फेफड़े का काम करता है, ऐसे में इसमें कूड़ाघर क्यों बनाया गया। चार साल से बंधवाड़ी प्लांट बंद है फिर भी रोजाना गुड़गांव व फरीदाबाद से करीब 1000 टन कूड़ा डाला जा रहा है। 
3-वन विभाग अरावली को संरक्षित करने का काम कर रहा है या फिर इसके विनाश के लिए। वह क्यों और किसके कहने पर निर्माण के लिए एनओसी जारी कर रहा है।
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