- दिल्ली हाईकोर्ट ने वायु सेवा के पूर्व सार्जेंट को दिव्यांगता पेंशन दिए जाने के आदेश को बरकरार रखते हुए की टिप्पणी
- अदालत ने केंद्र सरकार की अपील को खारिज करते हुए कहा कि ऐसे मामलों में उदारता पूर्वक सैनिकों को दी जाए पेंशन
गौरव बाजपेई
नई दिल्ली। हाईकोर्ट ने भारतीय वायु सेना के पूर्व सार्जेंट राकेश धर उपाध्याय को दिव्यांगता पेंशन दिए जाने के आदेश को बरकरार रखा है। केंद्र सरकार ने पूर्व अधिकारी को डिसलिपिडेमिया और प्राइमरी हाइपरटेंशन के कारण 30% विकलांगता के आधार पर विकलांगता पेंशन देने के सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (एएफटी) के 13 दिसंबर 2023 के आदेश को चुनौती दी थी। न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर और न्यायमूर्ति अजय दिगपाल की खंडपीठ ने यूनियन ऑफ इंडिया की याचिका को खारिज करते हुए फैसला सुनाया।
याचिकाकर्ता, यूनियन ऑफ इंडिया ने एएफटी के आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें पूर्व सर्जेंट उपाध्याय को उनकी स्वास्थ्य स्थिति के लिए विकलांगता पेंशन देने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट को बताया गया कि राकेश उपाध्याय ने 20 वर्ष और 16 महीने तक भारतीय वायु सेना में सेवा दी थी। उनकी रिहाई के समय रिलीज मेडिकल बोर्ड (आरएमबी) ने उन्हें डिसलिपिडेमिया और प्राइमरी हाइपरटेंशन के साथ निम्न चिकित्सा श्रेणी में पाया था। उपाध्याय ने अपनी स्व-घोषणा में स्पष्ट किया था कि वायु सेना में भर्ती होने से पहले उन्हें इन बीमारियों का कोई इतिहास नहीं था। इस घोषणा की सत्यता पर न तो आरएमबी ने और न ही याचिकाकर्ता ने कोई संदेह जताया। हालांकि, आरएमबी ने यह माना था कि ये बीमारियां सैन्य सेवा से संबंधित नहीं थीं, क्योंकि वे शांतिपूर्ण स्टेशन पर शुरू हुई थीं और इनका कोई प्रत्यक्ष संबंध क्षेत्रीय तनाव या सेवा से नहीं था।
आरएमबी ने डिसलिपिडेमिया को जीवनशैली और आहार संबंधी कारणों से जोड़ा, लेकिन कोर्ट ने पाया कि इस निष्कर्ष के लिए कोई ठोस कारण नहीं दिए गए। कोर्ट ने अपने हाल के फैसले, यूनियन ऑफ इंडिया बनाम गवास अनिल मालसो और सुप्रीम कोर्ट के 23 अप्रैल 2025 के फैसले, बिजेंद्र सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया का हवाला दिया। उसमें कहा कि यदि सेना में भर्ती के समय कोई बीमारी मौजूद नहीं थी तो यह मान लिया जाएगा कि बाद में होने वाली बीमारी सैन्य सेवा के कारण हुई। कोर्ट ने उल्लेख किया कि विकलांगता पेंशन एक लाभकारी प्रावधान है, जिसकी व्याख्या उदारतापूर्वक की जानी चाहिए। हाईकोर्ट ने पाया कि एएफटी का फैसला कानूनी त्रुटि से मुक्त है और इसे रद्द करने का कोई आधार नहीं है। एएफटी के आदेश का अनुपालन चार सप्ताह के भीतर सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया।