जिंदगी में सुर कभी शिकायत नहीं करते। प्रार्थना करते हैं। सुर के बिना बेसुरी हो जाती है जिंदगी। लेकिन, जिंदगी में सुर को जब रोशनी की जरूरत होती है, तो उसे शब्दों का साथ चाहिए होता है। इसलिए, सदियों से संगीत और साहित्य के बीच एक रिश्ता बना हुआ है। आज हम सब उसी रिश्ते को इस माहौल में महसूस कर पा रहे हैं। अमर उजाला शब्द सम्मान के पांचवें संस्करण में बुधवार को दिल्ली में मुख्य अतिथि के रूप में प्रख्यात बांसुरी वादक, संगीतकार और संगीत निर्देशक पंडित हरिप्रसाद चौरसिया ने ये बातें कहीं।
समारोह के दौरान पंडित हरिप्रसाद चौरसिया और उनके शिष्य राकेश चौरसिया की बांसुरी ने शब्द साधकों के साथ उपस्थित श्रोताओं का मन मोह लिया। जुगलबंदी के दौरान बांसुरी के मीठे सुरों की फुहार सीधे श्रोताओं के दिलों तक पहुंच रही थी। दोनों अंतर्मन से निकल रहे शब्दों को बांसुरी से सुरों में बदलते रहे। बनारस घराने के तबला वादक पंडित छन्नूलाल मिश्र के बेटे राम कुमार मिश्र की अंगुलियां तबले पर नृत्य कर संगत कर रही थीं। तीनों कलाकारों की जुगलबंदी जब शुरू हुई, तो सुर की लहरियों के साथ अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर का ऑडिटोरियम तालियों की गड़्गड़्ाहट से गूंजता रहा।
पंडित हरिप्रसाद चौरसिया और राकेश चौरसिया ने राग यमन से शब्द साधकों का स्वागत किया। यह शाम का राग है, जो प्रेम की प्रकृति का है। इसमें तीव्र मध्यम राग का प्रयोग किया जाता है। दोनों कलाकारों ने अधरों पर बांसुरी रखकर पहले तो मंद-मंद तान छेड़नी शुरू की। सुरों को जब तबले का साथ मिला, तो दोनों मानों एक-दूसरे का हाथ थामे साथ-साथ चल रहे हों। श्रोता शांत चित्त से बांसुरी को सुनते रहे...बीच में जब बांसुरी की तान उठती, तो लोगों का मन बरबस ही प्रफुल्लित हो उठता। करीब आधे घंटे तक यह जुगलबंदी श्रोताओं को सराबोर करती रही। पंडित हरिप्रसाद चौरसिया और राकेश चौरसिया ने आखिर में आज खेलो श्याम होली...गीत पर बांसुरी बजाई।
शब्दों के साधकों को सम्मानित करने के बाद पंडित हरिप्रसाद चौरसिया ने कहा, यह पहला अवसर है, जब मैं पुरस्कार ले नहीं रहा हूं, बल्कि सबको दे रहा हूं। अमर उजाला इस तरह के आयोजन में साहित्य के साथ कला को भी जोड़ ले। यह बहुत बड़ी बात है कि साहित्य को ऐसा अवसर दिया गया। ईश्वर करे कि अमर उजाला यह परंपरा बनाए रखे। उम्मीद है कि पांच साल की यह परंपरा 50 साल तक कायम रहेगी। दिल्ली में हमेशा बांसुरी से बात करता हूं। आज इच्छा हुई शब्दों में बोलने की, तो अच्छा लगा।