मेरा लिखा हुआ मेरी आत्मकथा ही है। सब कुछ मेरा जाना-पहचाना रहा है। मैंने जो अनुभव किया, आस-पास के लोगों, मिलने-जुलने वालों से, जो किताबें मैंने पढ़ी थीं, उन किताबों के अनुभव से मैंने जो पाया और जो अनुभव बनाया, वही मेरा अनुभव रहा है। वही मेरे लेखन में भी है।
मेरे बचपन में साहित्य, लेखन और किताबों की दुनिया का कोई अस्तित्व नहीं था। अखबार तीन दिनों की देरी से डाक द्वारा आते थे। किताब कभी-कभार ही मुझे मिलती थी। जब मैं हाईस्कूल में पहुंचा, मैंने हर चीज को पढ़ना शुरू किया। कहानियां, उपन्यास जो भी स्कूल के पुस्तकालय और नजदीक के घरों में उपलब्ध थे। पढ़ने के बाद मैं कुछ लिखना चाहता था। मैं जानता था कि मैंने जो पढ़ा है, वैसा नहीं लिख पाऊंगा, फिर भी मैंने कई पत्रिकाओं में अपनी कहानियां भेजीं। छपीं भी। मेरे घर की महिलाएं, मेरी मां और कुछ रिश्तेदारों ने मुझे बहुत प्रभावित किया।
मेरा आदर्श हमेशा मेरी मां रही हैं। मैंने जो भी लिखा, मेरी मां ने कुछ भी नहीं पढ़ा था, फिर भी उनसे मुझे लेखन की ऊर्जा मिलती रही। मैंने बचपन में अपनी मां और चाची से काफी कहानियां सुन रखी थीं। ऐसी कहानियां जब आप बड़े भी हो जाते हो तो आपके साथ रहती हैं। इसका असर मेरे लेखन पर पड़ा। मेरे पिता जी लंबे समय तक श्रीलंका में रहे, लेकिन मैं वहां कभी नहीं जा सका। धीरे-धीरे परिस्थितियां बदलीं। पीढ़ियां गुजरीं। उस समय जैसे हम रहते थे, बाद में सब कुछ पूरी तरह बदल चुका था।
जिंदगी को देखने का नजरिया भी बदल चुका था। यह सिर्फ मेरे मामले में नहीं था, बल्कि पूरी दुनिया के साहित्य की स्थिति भी यही थी। बदला हुआ समय मेरे लेखन में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। कहानी लिखने की मेरी शैली इस तरह है। जब मुझे कहानी का विचार आता है तो अधिकतर समय मैं सबसे पहले इसे मन में लिख लेता हूं। ऐसा करने के बाद ही मैं कहानी लिखने बैठता हूं। हां, जब कहानी को फिल्म का रूप दिया जाता है तो कई तरह समझौते करने पड़ते हैं। फिल्म एक अलग माध्यम है और उसके अनुसार कुछ चीजों को हटाना होता है। कई बार हम कुछ चीजों को जोड़ने के लिए स्वतंत्र होते हैं, लेकिन कहानी को कोई हरा नहीं सकता है। हां, जहां तक मेरा सवाल है, मैं हमेशा साहित्य को पसंद करता रहा हूं।