फेडरेशन ऑफ रेजीडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. सुमेध से जब बार बार हड़ताल होने और उनका निष्कर्ष जीरो निकलने को लेकर सवाल किया तो उन्होंने कहा कि कोई भी डॉक्टर जान-बूझकर हड़ताल नहीं करता है। सरकारी अस्पतालों के हालात ऐसे हैं कि डॉक्टरों को नहीं चाहते हुए भी विरोध के रास्ते पर चलना पड़ता है। उन्होंने दुर्भाग्य जताते हुए कहा कि दिल्ली में हड़ताल होने की चिंता उन्हें भी है, लेकिन सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए और खामियों को दूर करना चाहिए।
दिल्ली में दो दिन के लिए ज्यादा होती हैं हड़ताल
साल की पहली हड़ताल 13 जनवरी को सफदरजंग अस्पताल में हुई। 29 अप्रैल को लोकनायक अस्पताल में, 20 मई को हिंदूराव, 12 जून को डीडीयू और 1 जुलाई को हिंदूराव अस्पताल में हुई डॉक्टरों की हड़ताल कम से कम दो दिन तक चली है। ठीक ऐसे ही हालात वर्ष 2018 के देखने को मिले। पिछले वर्ष डॉक्टरों की 20 बार हड़ताल हुई। इनमें 16 हड़ताल दो दिन ही चली थीं। इसे लेकर डॉक्टर भी अब मानने लगे हैं कि दिल्ली में दो दिन के लिए ज्यादा हड़ताल होती हैं।