सोमवार सुबह वक्त करीब 9 बजे हो चला था। एम्स के गेट नंबर 1 पर मरीजों और उनके साथ दूरदराज से आए तीमारदारों की चहलकदमी बढ़ती जा रही थी। गाड़ियों का तेज सायरन और सुरक्षा गार्डों की सीटी की आवाज लोगों को आगे बढ़ने की दिशा दे रही थी। इसी बीच सामने दिखता काला मंजर हर किसी के पांव रोक दे रहा था। हर कोई उस जली हुई इमारत को देखता और अपने फोन में कैद करने लगता। फिर आपस में चर्चा करते हुए आगे बढ़ जाते। यहां से निकल रहे डॉक्टरों के साथ भी ऐसा ही था। एम्स परिसर में हजारों आंखें बार-बार आग की लपटों में स्वाहा हुए टीचिंग ब्लॉक को देखे जा रही थीं।
इसी बीच एम्स में 39 वर्ष से मरीजों का उपचार कर रहे एक वरिष्ठ डॉक्टर राजकुमारी अमृत कौर ओपीडी से गुजरते हैं। एक हाथ में एप्रेन तो दूसरे में फोन। गले में स्टेथोस्कोप और आंखें सुरक लाल। पूछने पर पता चला कि वे 72 घंटे से सोए नहीं हैं। बीती शनिवार रात से ही वे एम्स में पहले आग से मरीजों को बचाने और बाद में कभी बैठक तो कभी विभाग इत्यादि को संभालने में लगे हैं। चर्चा का दौर अभी शुरू ही हुआ था कि पीछे करीब सात से आठ जूनियर डॉक्टर उनके समीप पहुंचे। उन्होंने कहा, ये लोग भी एक-दो घंटे की नींद लेकर फिर आ गए हैं। इतने साल के अनुभव में उन्होंने आज तक एम्स में ऐसा मंजर नहीं देखा, जबकि वे यहीं से एमबीबीएस और एमडी करके मरीजों का इलाज कर रहे हैं।
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ओपीडी से जनऔषधि केंद्र होते ही निदेशक कार्यालय पहुंचने ही वाले थे कि तभी चार नर्सें आपस में बात करते हुए अंदर जा रही थीं। उनके पीछे-पीछे जब बढ़े तो आग की लपेटों की चमक और उसकी तपिश उनकी शब्दों से बयां हो रही थी। पूछने पर पता चला कि वे छुट्टी पर चल रही थीं, टीवी पर आग देखी तो शनिवार रात से ही एम्स में आकर सेवा देने लगीं। तभी पता चला कि नर्स के अलावा करीब 100 जूनियर डॉक्टर भी अपनी छुट्टियां खत्म कर एम्स पहुंच गए थे।
निदेशक कार्यालय से होते हुए डॉ. बीआर आंबेडकर कैंसर ब्लॉक में भर्ती मरीजों के तीमारदार सीढ़ियों पर बैठे बस आग पर ही अपने बयान दिए जा रहे थे। कोई कह रहा था कि उसने सबसे पहले बताया तो कोई कह रहा था कि पानी पीछे से डालना चाहिए था। कुछ लोग भगवान का शुक्रिया करते हुए इस बड़ी घटना में सभी मरीज सुरक्षित होने का जिक्र कर रहे थे। सोमवार को हर कोई डॉक्टर, नर्स, ओटी टेक्नीशियन और सफाई कर्मचारी इत्यादि बस अस्पताल की सेवाओं को वापस से पटरी पर लाने में जुटे थे।
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