डॉक्टरों के अनुसार मरीज के पसीने में क्लोराइड की मात्रा का पता करके रोग की पहचान की जा सकती है। करीब एक हजार रुपये की लागत से बनी एम्स की स्वीट क्लोराइट टेस्ट मशीन में एमीमीटर और रेगुलेटर लगा होता है। एमीमीटर के नेगेटिव और पॉजिटिव इलेक्ट्रो को हाथ पर चिपकाया जाता है।
इस जांच में मिथाइल अल्कोहल, मिलीक्यू वॉटर, फिल्टर पेपर का इस्तेमाल भी किया जाता है। अभी तक करीब 10 हजार से ज्यादा जांच हो चुकी हैं। कई अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल में भी वैज्ञानिकों ने एम्स की इस मशीन को दुनिया का सबसे बेहतर मॉडल बताया है।
नशा छोड़ने वालों की कला ने किया हैरान
एम्स का हरेक कर्मचारी उस वक्त हैरान हो जाता है जब उसके सामने नशा छोड़ने वालों की कला दिखाई देती है। शराब, अफीम, चरस, सिगरेट जैसे नशे की लत को छुड़ाने के लिए कई लोग एम्स में भर्ती हुए थे। तमाम काउंसलिंग और दवाओं के जरिये जब इन्होंने नशा छोड़ा तो इनके भीतर की कला उभर कर सामने आई।
गाजियाबाद स्थित एम्स के नेशनल ड्रग डिपेंडेस ट्रीटमेंट सेंटर में भर्ती इन मरीजों ने हस्तकला का प्रदर्शन दिखाते हुए कई उत्पाद तैयार किए हैं। इन सभी उत्पादों की प्रदर्शनी एम्स के 64वें स्थापना दिवस पर निदेशक कार्यालय में लगी है। बृहस्पतिवार को प्रदर्शनी देखने पहुंचे डॉक्टर व नर्सिंग कर्मचारियों ने जब नशा छोड़ने वालों की हस्तकला देखे तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ।
उन्होंने प्रदर्शनी के प्रतिनिधि से इसके बारे में पूछा तो पता चला कि वे अपने मरीजों को हमेशा ही ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। ये मरीज अस्पताल से डिस्चॉर्ज हो चुके हैं लेकिन अपनी कला को एक पहचान के रूप में एम्स में ही छोड़ गए हैं। यह सुन हर कोई अपने फोन में मरीजों की कला को कैद कर रहे हैं और सोशल मीडिया पर इसे पोस्ट भी कर रहे हैं। एम्स के ही मनोरोग विशेषज्ञों का कहना है कि नशा किसी भी इंसान की क्षमता और सोच दोनों को प्रभावित करता है।