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शोर छीन रहा सुनने की क्षमता: AIIMS के अध्यन में चौंकाने वाला खुलासा, शहरों में हर 10वां व्यक्ति हो रहा बहरा

Mon, 15 Jan 2024 09:12 PM IST
Vikas Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

अध्ययन के लिए एम्स ने दिल्ली, शिमला, शिलोंग, बंगलूरू, रायपुर और भाव नगर के केंद्र में करीब 90 हजार लोगों की जांच की। हर केंद्र में करीब 15 हजार लोगों की जांच हुई। जांच में पाया गया कि 9.1 फीसदी लोगों में सुनने की समस्या है। 
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एम्स ने आईसीएमआर के सहयोग से किया अध्ययन - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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हमारे आसपास का शोर सुनने की क्षमता को छीन रहा है। हालत यह है कि हर 10वें व्यक्ति में बहरेपन की समस्या होने लगी है। उन्हें किसी एक या दोनों कानों से सुनने में परेशानी हो रही है। सुनने की बढ़ती समस्या का कारण जानने के लिए एम्स ने आईसीएमआर के सहयोग से एक अध्ययन किया।

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अध्ययन के लिए एम्स ने दिल्ली, शिमला, शिलोंग, बंगलूरू, रायपुर और भाव नगर के केंद्र में करीब 90 हजार लोगों की जांच की। हर केंद्र में करीब 15 हजार लोगों की जांच हुई। जांच में पाया गया कि 9.1 फीसदी लोगों में सुनने की समस्या है। इनके एक या दोनों कानों में किसी न किसी तरह की परेशानी है। वहीं 3.1 फीसदी लोगों में सुनने की समस्या काफी गंभीर पाई गई। यह दिव्यांगता की श्रेणी में पहुंच गए। हालांकि राहत की बात है कि कान बहने की समस्या में कुछ कमी आई है। ग्रामीण क्षेत्रों के मुकाबले शहरी क्षेत्र में समस्या ज्यादा है। इसका बड़ा कारण आसपास के क्षेत्र में होने वाला शोर है। शहरी क्षेत्र में हर समय मानक से अधिक शोर रहता है।

एम्स के कान, नाक और गला के विभागाध्यक्ष डॉ. आलोक ठक्कर ने कहा कि सामान्य दिनों में 45 साल के बाद लोगों में सुनने की समस्या धीरे-धीरे कम होती है, लेकिन आसपास बढ़े शोर के कारण लोगों की सुनने की समस्या बढ़ गई है। तंबाकू के सेवन के कारण भी सुनने की क्षमता प्रभावित होती है। यह हमारे नर्वस सिस्टम पर असर डालता है।

अध्ययन से जुड़े तथ्य
कुल लोग - 90 हजार
कुल केंद्रों - 6
एक केंद्र पर लोग - 15 हजार

परिणाम
सुनने की समस्या - 9.1 फीसदी लोगों में
दिव्यांगता की स्थिति - 3.1 फीसदी में
सुनने की क्षमता हो सकती है ठीक, मौजूद है इलाज

डॉ. ठक्कर ने कहा कि सुनने की समस्या का इलाज मौजूद है। सामान्य परेशानी के लिए कान में इंप्लांट लगाया जाता है। स्थिति गंभीर होने पर दिमाग की नसों में इलेक्ट्रॉन की तरंग दी जाती हैं। इनकी मदद से न केवल सुनने की क्षमता बढ़ती है, बल्कि उन तरंगों को समझने की क्षमता मिलती है।

बोलने की क्षमता खो चुके मरीजों को स्वदेशी वॉल्व से मिलेगी बड़ी राहत
कैंसर या अन्य कारणों से बोलने की क्षमता खो चुके मरीजों को स्वदेशी वॉल्व से बड़ी राहत मिलेगी। यह वॉल्व यूरोप से आने वाले इंप्लांट के मुकाबले करीब 50 गुना सस्ता होगा। इसकी गुणवत्ता भी बेहतर होगी। दरअसल एम्स ने दिल्ली आईआईटी के साथ मिलकर स्वदेशी वॉल्व (ट्रेकिओ-एसोफैगल स्पीच प्रोस्थेसिस) तैयार किया है। इसका इस्तेमाल गले के एडवांस स्टेज के कैंसर के मरीजों में किया जाता है। ऐसे मरीजों की सर्जरी के दौरान कई बार आवाज चली जाती है। ऐसे में गले से वॉयस बॉक्स निकाले के बाद भी आवाज बचाई जा सकेगी। एम्स ने 20 मरीजों पर इसका सफल ट्रायल किया है। एम्स फिलहाल इसे मुफ्त उपलब्ध करा रहा है।

इस बारे में डॉ. आलोक ठक्कर का कहना है कि अभी यूरोप में निर्मित वॉल्व की कीमत 45 हजार रुपये तक है। संक्रमण को रोकने के लिए हर छह माह में इसे बदलना पड़ता है। ऐसे में गरीब मरीज इन्हें खरीदने में सामर्थ्य नहीं होते। इसे देखते हुए एम्स और आईआईटी दिल्ली ने मिलकर सस्ता वॉल्व तैयार किया। एम्स में 20 मरीजों पर चरण-एक व चरण-दो का ट्रायल किया गया है। पहले चरण के ट्रायल के बाद इसके डिजाइन में थोड़ा बदलाव किया गया है। इसकी गुणवत्ता मानक के अनुरूप है। एक बार वॉल्व लगाने के बाद छह से आठ माह तक इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। हर छह से आठ माह पर वॉल्व बदलना पड़ता है। ट्रायल में शामिल सभी मरीज इस वॉल्व की मदद से ठीक से बोल पा रहे हैं। ट्रायल की प्रक्रिया पूरी होने के बाद किसी कंपनी को यह तकनीक स्थानांतरित की जाएगी, ताकि मरीजों तक इसकी सुविधा पहुंच सके। उम्मीद की जा रही है कि इसकी कीमत एक से दो हजार रुपये हो सकती है।
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सांस और खाने में मिलने से रोकता है वॉल्व
विभाग के प्रोफेसर डॉ. राकेश कुमार का कहना है कि भोजन नली और सांस की नली के पास बीच में यह वॉल्व लगाया जाता है। यह वॉल्व भोजन के अंश को सांस की नली में नहीं आने देता है और हवा को सांस नली में जाने देता है। यह वॉल्व जरूरत के आधार पर बोलने में मदद करता है। यदि एक ही वॉल्व अधिक समय तक लगा रहे तो फंगल संक्रमण होने का खतरा रहता है, इसलिए हर छह से आठ माह पर बदलना जरूरी होता है। इसके लिए किसी सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ती। ओपीडी में ही वॉल्व बदल दिया जाता है।
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