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आडवाणी और सुषमा के चहेतों को क्यों नहीं मिली जगह

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विधानसभा टिकट बंटवारे के बाद यूं ही नहीं घमासान मचा है। टिकट के बंटवारे में संघ व अरूण जेटली के चहेतों ने तो खूब टिकट बंटोरा है, लेकिन दिल्ली की राजनीति में अहमियत रखने वाले लाल कृष्ण आडवाणी व सुषमा स्वराज के कई चहेतों को दरकिनार कर दिया गया है।
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इतना ही नहीं पार्टी को सींचने वाले पूर्व मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना के बेटे को भी तरजीह नहीं दी गई है। सबका साथ सबका विकास का नारा देने वाली पार्टी ने मुस्लिम समुदाय से महज एक प्रत्याशी को चुनावी मैदान में उतारा है।

प्रत्याशियों की पहली सूची पर अगर ध्यान तो संघ से जुड़े नेताओं को ज्यादा तरजीह मिली है। माना जाता है कि नंद किशोर गर्ग, राजकुमार फुलवारी, राम किशन सिंघल, संजय जैन, कुलवंत राणा, रेखा गुप्ता, योगेंद्र चंदोलिया समेत कई प्रत्याशी संघ व संगठन के काफी करीबी रहे है।
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अरुण जेटली के करीबियों को मिली तरजीह

नेताओं की अगर बात करें तो केंद्रीय मंत्री अरूण जेटली के करीबियों को भी काफी तरजीह मिली है। जेटली कैंप के सरदार आरपी सिंह, रजनी अब्बी, नरेश गौड़, जितेंद्र महाजन माने जाते है।

वहीं आडवाणी कैंप की मानी जाने वाली आरती मेहरा को पार्टी ने दरकिनार किया है तो सुषमा स्वराज की मानी जाने वाली शिखा राय को भी पार्टी ने टिकट नहीं दिया है। यहीं नहीं दिल्ली भाजपा को सींचने वाले पूर्व मुख्यमंत्री मदनलाल खुराने के बेटे हरीश खुराना को भी दरकिनार कर दिया गया है।

पिछले चुनाव में भाग्य आजमाने वाले जीतने वाले प्रत्याशियों पर तो पार्टी ने दांव लगाया है, लेकिन हारने वालों को किनारा लगा दिया है। जबकि हारे हुए प्रत्याशियों के मेहनत के बल पर ही पिछले लोकसभा में 70 विधानसभा में 60 विधानसभा में पार्टी प्रत्याशी बढ़त हासिल किए थे। उनसे वादा भी किया गया था कि पार्टी लोकसभा चुनाव की मेहनत को आधार बनाकर टिकट का बंटवारा करेगी।
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इनको नहीं मिल पाई जगह

पंजाबी, बनिया, पूर्वाचली, उत्तराखंडी नेता भी टिकट के बंटवारे से असंतुष्ट है। पंजाबी नेताओं का कहना है कि दिल्ली में 30 प्रतिशत से भी अधिक आबादी पंजाबियों की है। लेकिन महज आधा दर्जन ही इस वर्ग को सीट मिले है।

इसी तरह वैश्य नेताओं का कहना है कि 8 नेताओं को ही प्रत्याशी बनाया गया है। सभी वर्ग के नेताओं का तर्क है कि जाट व गूजरों की आबादी से कही अधिक टिकट मिला है। बताते है कि 8 जाट व 9 गूजर नेताओं को टिकट दिया गया है।

इतना ही नहीं इनमें ज्यादातर बाहर से पार्टी में शामिल होने वाले नेताओं को टिकट दिया गया है। पार्टी नेताओं की नाराजगी इस बात का लेकर भी है कि चार सीट अकाली दल को गठबंधन के तहत दी ही गई है साथ ही इस समुदाय से तीन प्रत्याशियों को भाजपा ने भी टिकट दिया है।
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