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राष्ट्रपति द्वारा गोद लिए गांव में बिजली-पानी के लिए तरस रहे ग्रामीण

Thu, 30 Jun 2016 02:12 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, गुड़गांव
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राष्ट्रपति का गोद लिया गांव - फोटो : अमर उजाला
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साइबर सिटी के मुख्यालय से 39 किलोमीटर दूर फर्रूखनगर खंड का गांव ताजनगर को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने आदर्श गांव बनाने के लिए गोद लिया है। दो जुलाई को वे राष्ट्रपति भवन से गुड़गांव और मेवात के पांच गांवों को आदर्श बनाने की योजना की शुरुआत करेंगे।
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इनमें ताज नगर भी शामिल है, जहां बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव से लोग जूझ रहे हैं। राष्ट्रपति के कार्यक्रम को लेकर जिला प्रशासन से लेकर राष्ट्रपति सचिवालय के आला अधिकारियों की नजर यहां है। पेश है संवाददाता शाहनवाज आलम और फोटोग्राफर दिनेश कुमार की ग्राउंड रिपोर्ट-

पटौदी रोड पर बने लॉजिस्टिक और वेयरहाउस हब के बीच से निकलते रास्ते के बाद गेंदे की खेती के लिए मशहूर गांव ताज नगर शुरू होता है। गांव में पक्की सड़कों के साथ गुजरते रास्ते और पक्के मकान यहां की खुशहाली का परिचय देते हैं, लेकिन राष्ट्रपति के बनने वाला आदर्श गांव बिजली-पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं से महरूम है।
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हालत यह है किमहीने के 720 घंटे में यहां महज 120 घंटे बिजली आती है। 585 घर वाले इस गांव की सड़कों के दोनों ओर 25 केवी के 40 ट्रांसफर लगे हैं, लेकिन बीते चार वर्षों से यह चले ही नहीं हैं। ऐसे में यहां शाम होते ही अंधेरा छा जाता है। 2380 मतदाताओं वाले इस गांव में पानी का अभाव भी एक बड़ी
समस्या है। बिजली-पानी की आपूर्ति नहीं होने के कारण यहां मूल पेशा खेती भी खतरे में हैं।

लोग लागत और मुनाफा के बीच अटकी गेंदे की खेती को छोड़कर अब अनाज की खेती करने लगे हैं, लेकिन पानी की कमी के कारण उन्हें हमेशा दिक्कत होती है। इसके लिए विधायक-सांसद से लेकर मुख्यमंत्री तक के गुहार लगा चुके हैं, लेकिन नतीजा सिफर है।

मरीजों को 10 किलोमीटर दूर फर्रूखनगर भेजना पड़ता है

राष्ट्रपति का गोद लिया गांव - फोटो : अमर उजाला
इसके अलावा यहां मौजूद कृषि विकास अधिकारी का दफ्तर बंद हो चुका है और अब यहां ग्रामीण अपनी गाय भैंस बांधते हैं। महिलाएं खुद सिलाई-कढ़ाई का रोजगार चलाती हैं। राष्ट्रपति के गोद लेने के बाद उन्हें उम्मीद है कि बिजली-पानी, शिक्षा जैसी समस्या सुधरेगी।

सेना में सूबेदार पद से रिटायर्ड हुए समय सिंह बताते हैं एक दिन बिजली सुबह 6 से दोपहर 12 बजे तक आती है तो फिर अगले दिन दोपहर में 2 से 4 बजे तक। इतनी ही देर में एक से दो घंटे कभी भी पानी आता है। खेत के लिए रातमें 3 बजे पानी आता है। इसके लिए ऑटोमेटिक सिस्टम लगाया हुआ है।

न वरिष्ठ माध्यमिक स्कूल और न ही कॉलेज
81.09 फीसदी साक्षरता वाले इस गांव में शिक्षा के लिए एक सरकारी प्राथमिक और एक माध्यमिक स्कूल है। इसके बाद जिन्हें पढ़ना है, वे फर्रूखनगर या दूसरे गांवों में जाकर शिक्षा लेते हैं। कई छात्राओं को पढ़ने के लिए दूर जाना पड़ता है,ऐसे में वे पढ़ाई छोड़ देती हैं तो कुछ की पढ़ाई छुड़वा दी जाती है।

करीब 12 फीसदी ड्रॉप रेट हैं। स्किल और वोकेशनल एजुकेशन के नाम पर सब शून्य है। अकुशल युवाओं के हाथ में रोजगार नहीं होने के कारण वेयरहाउस में ठेके पर काम करते हैं।

हवलदार के पद से रिटायर्ड बलवान सिंह अपनी बेटी को एसजीटी यूनिवर्सिटी से बीडीएस करा रहे हैं, लेकिन वे कहते हैं यहां पढ़ाना बहुत मुश्किल है। इस वर्ष 12वीं पास बेटे को कॉलेज में दाखिला दिलाना चाहते हैं, लेकिन आसपास कॉलेजनहीं होने के कारण 39 किलोमीटर गुड़गांव में आवेदन किया। हालांकि गांव से करीब 5 किलोमीटर आगे कई इंजीनियरिंग कॉलेज की दुकानें हैं।
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3000 की आबादी तीन स्वास्थ्यकर्मी के सहारे

राष्ट्रपति का गोद लिया गांव - फोटो : अमर उजाला
स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर यहां महज एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है। बुधवार दोपहर वह बंद मिला। सूचना मिली कि फर्रूखनगर में सभी किसी बैठक में हिस्सा लेने गए हैं। एक एएनएम, एक नर्स और एक पुरुष स्वास्थ्य कर्मी के सहारे दो कमरे में चलने वाले इस स्वास्थ्य केंद्र में डिलीवरी की व्यवस्था है।

24 घंटे चलने वाले इस केंद्र में इंतजाम के तौर पर यहां इनवर्टर तो हैं, लेकिन कई बार रात में यह भी बंद हो जाता है। 48 वर्षीय राजबाला बताती हैं कि कई बार टॉर्च की रोशनी में डिलीवरी हुई है। दवाएं भी नहीं मिलती हैं। गंभीर स्थिति में मरीजों को दस किलोमीटर दूर फर्रूखनगर भेज दिया जाता है। पूछने पर कहा जाता है कि जो सरकार ने दिया है, वहीं दे सकते हैं।

रेलवे स्टेशन पर नहीं मिलती ट्रेनों की सूचना
शहर से दूर होने के बावजूद यहां सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था चरमराई हुई है। 2010 में गांव वालों ने अपने पैसे से इसे बनवाया था। रेलवे स्टेशन पर आज भी टिकट ठप्पा लगाकर दिया जाता है। यहां न तो बिजली आती है और न ही ट्रेनों के आने-जाने की सूचना दी जाती है।

इस रेलवे स्टेशन पर कार्यरत ताजनगर निवासी बुकिंग क्लर्क रतिराम (57) कहते ने बताया कि टेलीफोन की सुविधा न होने से कोई भी जानकारी समय पर नहीं मिलती है। रोजाना 400 से अधिक टिकट बनाने वाला बिक्री केंद्र रतिराम के सहारे चलता है। छुट़्टी पर जाने की सूरत में यह जिम्मा दूसरे को देना होता है।

गांव को विकास का इंतजार
हाल में हुए चुनाव के पद सरपंच बने 24 वर्षीय ललित यादव कहते हैं कि पंचायत के पास 110 एकड़ जमीन है। इस पर गांव के लिए कॉलेज और यूनिवर्सिटी खोलने के लिए राज्य सरकार से गुहार लगाई जा रही है।

इसके अलावा गांव में कम्युनिटी सेंटर और स्किल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट खोलने की जरूरत है। हालांकि अब आदर्श गांव बनाने के लिए चुने जाने केबाद से वह विकास को लेकर आश्वस्त दिखते हैं।
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