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बिजली तक पहुंच जीवन का अधिकार : हाईकोर्ट

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दिल्ली हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा बताया
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। बिजली तक पहुंच भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। इसे किसी व्यक्ति से सिर्फ मकान मालिक-किरायेदार विवाद के कारण छीना नहीं जा सकता। दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति मिनी पुष्कर्णा की एकल पीठ ने यह टिप्पणी मैकी जैन बनाम बीएसईएस राजधानी पावर लिमिटेड के मामले में की। अदालत ने बीएसईएस को तत्काल बिजली आपूर्ति करने का निर्देश दिया है।
याचिकाकर्ता मैकी जैन ने बताया कि वह 2016 से पश्चिम दिल्ली में एक संपत्ति के तीसरे मंजिल पर रजिस्टर्ड लीज डीड के तहत किरायेदार के रूप में रह रही हैं। सितंबर और अक्तूबर 2025 के बिजली बिल का भुगतान न हो पाने के कारण 28 नवंबर 2025 को बिजली कनेक्शन काट दिया गया। याचिकाकर्ता ने उसी दिन सभी बकाया राशि जमा कर दी, लेकिन बीएसईएस ने मकान मालिकों से नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (एनओसी) न होने का हवाला देकर कनेक्शन बहाल करने से इन्कार कर दिया। इस दौरान मकान मालिक ने कथित तौर पर सहयोग नहीं किया।
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बिजली मूलभूत जरूरत
दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक किसी सक्षम अदालत से बेदखली का आदेश नहीं होता, याचिकाकर्ता का कब्जा अवैध नहीं माना जा सकता। न्यायमूर्ति पुष्कर्णा ने कहा, किसी भी नागरिक से बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित होकर जीवन जीने की उम्मीद नहीं की जा सकती। बिजली जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। अदालत ने कहा कि मकान मालिक-किरायेदार के लंबित विवाद को आधार बनाकर बिजली जैसी मूल सुविधा से किसी को वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने बीएसईएस राजधानी पावर लिमिटेड को मौजूदा मीटर से तीसरे मंजिल पर बिजली आपूर्ति तुरंत बहाल करने का निर्देश दिया, बिना मकान मालिकों से एनओसी की मांग किए। याचिकाकर्ता को भविष्य में बिल समय पर जमा करने की हिदायत भी दी गई।
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