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Delhi NCR News: एबीवीपी ने चुनाव लड़ने में लगाए थे 14 साल, आज दबदबे की लड़ाई

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-1949 में गठन, 1954 में शुरू हुए चुनाव, 1968 में चुनावी मैदान में पहली बार उतरी थी
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विनोद डबास
नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (डूसू) चुनाव में इस बार फिर भाजपा समर्थित अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) और कांग्रेस समर्थित नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई) के बीच मुकाबला चर्चा में है। 18 सितंबर को प्रस्तावित चुनाव के लिए दोनों संगठन छात्रों के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने और छात्र हितों से जुड़े मुद्दों को चुनावी एजेंडे में शामिल करने में जुटे हैं। हालांकि, आज डूसू की राजनीति में प्रभावशाली ताकत बन चुकी एबीवीपी का चुनावी सफर इतनी तेजी से शुरू नहीं हुआ था। संगठन ने अपना पहला डूसू चुनाव लड़ने में ही 14 साल लगा दिए थे।
एबीवीपी का गठन 1949 में हुआ था, जबकि डूसू चुनाव की शुरुआत 1954 में हुई। इसके बावजूद संगठन ने पहली बार 1968 में डूसू चुनाव में औपचारिक तौर पर कदम रखा। उस समय विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में कांग्रेस समर्थित छात्र गुटों का प्रभाव मजबूत था। हालांकि एबीवीपी परिसर में छात्र गतिविधियों और वैचारिक स्तर पर पहले से सक्रिय थी, लेकिन चुनावी राजनीति में उतरना उसके लिए आसान नहीं रहा।
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पहले कदम पर ही मिली लगातार तीन हार
1968 में चुनावी मैदान में उतरने के बाद एबीवीपी को लगातार तीन चुनावों में हार का सामना करना पड़ा। कांग्रेस समर्थित गुटों की मजबूत पकड़ के बीच संगठन ने धीरे-धीरे अपनी राजनीतिक जमीन तैयार की। शुरुआती हार के बावजूद उसने चुनावी राजनीति से दूरी नहीं बनाई और छात्र मुद्दों, संगठनात्मक गतिविधियों तथा कैंपस में लगातार सक्रियता के जरिए अपना आधार मजबूत करने का प्रयास जारी रखा। यही शुरुआती संघर्ष आगे चलकर उसकी चुनावी ताकत की नींव बना।



एनएसयूआई की शुरुआत भी हार से
डूसू की मौजूदा प्रतिद्वंद्विता में एबीवीपी के सामने एनएसयूआई भी मजबूती से मैदान में है। एनएसयूआई का गठन 1971 में हुआ और उसने 1972 में पहली बार डूसू चुनाव लड़ा। हालांकि शुरुआती दौर में उसे भी लगातार हार का सामना करना पड़ा। 1972, 1973, 1974 और 1977 में एनएसयूआई चुनाव हार गई। 1975 और 1976 में आपातकाल के कारण डूसू चुनाव नहीं हुए थे।



अब पुराने प्रतिद्वंद्वी आमने-सामने
एनएसयूआई ने 2024 में अध्यक्ष पद जीता था, लेकिन 2025 में यह पद एबीवीपी के खाते में चला गया। अब एनएसयूआई वापसी की कोशिश में है, जबकि एबीवीपी अपना प्रभाव बरकरार रखने की रणनीति पर काम कर रही है। कैंपस सुविधाएं, शिक्षा, छात्र हित और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे दोनों संगठनों के अभियान में प्रमुखता पा रहे हैं।
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इस लिहाज से 18 सितंबर का चुनाव सिर्फ दो छात्र संगठनों की चुनावी टक्कर नहीं, बल्कि एबीवीपी के लंबे प्रभाव को बनाए रखने और एनएसयूआई के दोबारा चुनौती पेश करने की परीक्षा भी होगा।
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