लाल दुर्ग में भगवा ने लाल झंडे को सीधे चुनौती दी है। आइसा की लगातार चौथी जीत के बीच एबीवीपी ने उसके वोट बैंक में सेंध लगाते हुए स्कूल काउंसलर में पहली बार नंबर वन का खिताब जीता है तो सेंट्रल पैनल में सबसे अधिक वोट लेकर दूसरे नंबर पर रहने का रिकार्ड बनाया है। लाल दुर्ग में एबीवीपी को मिली वोटों की बढ़त फगवा एंट्री तो मोदी फैक्टर का जादू माना जा रहा है, जिसे लेफ्ट संगठनों के छात्र भी मान रहे हैं।
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लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा पूरे देश की भांति भले ही बंगाल में कोई खास प्रदर्शन नहीं कर पाई, लेकिन उसके सहयोगी संगठन एबीवीपी ने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के लाल दुर्ग में लाल झंडे को पटखनी दे दी है।
छात्रसंघ चुनाव में पहली बार एबीवीपी ने स्कूल काउंसलर पदों में सबसे अधिक सीट जीतकर इतिहास रचा है। लाल झंडे को सलाम करने वाले छात्रों के बीच मोदी फैक्टर का जादू चल निकला है।
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अच्छे दिनों पर भरोसा जताते हुए मतदाताओं ने स्कूल काउंसलर में सबसे अधिक सीट पर जीत हासिल करवाने के अलावा सेंट्रल पैनल में लेफ्ट विचारधारा के एसएफआई और लेफ्ट प्रोग्रेसिव फ्रंट(डीएसएफ, एसएफआई व एआईएसएफ) से अपने मतों को सीधे मोदी फैक्टर से जोड़ते हुए भगवा झंडा फहराने के लिए जमीन तैयार कर दी है।
अगर डीयू जैसा प्रचार करती तो जीत जाती एबीवीपी
अभी तक जेएनयू में लेफ्ट प्रभावित छात्र संगठनों को ही मतदाता सलाम करते हैं, लेकिन पहली बार मोदी फैक्टर समेत घोषणा पत्र में पाठ्यक्रम बदलाव के मुद्दे ने मतदाताओं को प्रभावित किया। यह मोदी का ही जादू है, जिसके चलते स्कूल काउंसलर में सबसे अधिक सीट जीतकर नंबर वन और सेंट्रल पैनल में दूसरे नंबर का स्थान हासिल किया है।
हालांकि यदि दिल्ली बीजेपी व प्रदेश एबीवीपी ने दिल्ली विश्वविद्यालय समेत अन्य विश्वविद्यालयों की तर्ज पर जेएनयू के लाल दुर्ग की समस्याओं व मुद्दों को भुनाने की पहल की होती तो छात्रसंघ चुनाव में डीयू की तर्ज पर एबीवीपी का परचम लहराता।
जेएनयू एबीवीपी पदाधिकारी अभिषेक के मुताबिक, यदि बड़े नेताओं ने जेएनयू की ओर देखा होता तो शायद डीयू की तर्ज पर हम भी इतिहास रचने में पूरी तरह कामयाब हो जाते क्योंकि आइसा को जीत तो मिली, लेकिन वोट बैंक में सेंध लग गयी है।
आइसा के वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए एबीवीपी के साथ-साथ अन्य लेफ्ट संगठन भी हावी थे, जोकि किसी भी कीमत पर आइसा का वर्चस्व खत्म करना उनका मकसद बन गया था, जिसके चलते पहली बार तीन संगठनों ने एक सांझा मोर्चा बनाकर आइसा को टक्कर दी।
उत्तर भारतीय छात्रों ने दिलाई बढ़त
जेएनयू बेशक लाल दुर्ग के नाम से फैमस है, लेकिन अब मतदाताओं की सोच बदल रही है। जेएनयू में अब यूपी, एमपी, बिहार, पंजाब, उत्तराखंड, कश्मीर, हरियाणा आदि के छात्रों का दबदबा बढ़ रहा है, जोकि बीजेपी या कांग्रेंस विचारधारा से प्रभावित होते हैं।
इसके अलावा डीयू से पासआउट छात्रों की संख्या भी हजारों में हैं। इन सभी मतदाताओं के चलते एबीवीपी को दूसरे नंबर की जीत हासिल करवाने का मौका दिया है।
हालांकि यदि प्रदेश बीजेपी या एबीवीपी का बड़ा चेहरा चुनावी प्रचार के लिए जाता तो वोट बैंक इससे भी अधिक होता। क्योंकि कुछ महीने पहले आरएसएस के एक बडे़ संघ सदस्य के जेएनयू में दौरे के दौरान अत्यधिक भीड़ जुटी थी। ऐसे में एबीवीपी, संघ या बीजेपी उसे भुनाती तो तस्वीर का रूख कुछ ओर हो सकता था।
मोदी फैक्टर ने दिलायी बढ़त जेएनयू में आइसा पदाधिकारी, सुचेता डे ने बताया कि बेशक आजकल देशभर में मोदी फैक्टर हावी है, जिसके चलते जेएनयू में एबीवीपी को बढ़त मिली है, लेकिन यह जीत वर्ष 2015 के चुनाव तक जारी नहीं रहेगी। क्योंकि तब तक मतदाताओं को मोदी फैक्टर की हवा निकलती दिख गयी होगी। हालांकि एबीवीपी को बढ़त के बीच अन्य लेफ्ट संगठनों के पिछड़ना एक बड़ा मुद्दा है। वोट बैंक को बढ़ाने समेत मुद्दों को पूरा कर हम अपनी जीत को बरकरार रखेंगे।
जेएनयू में एबीवीपी के अध्यक्ष पद के प्रत्याशी सौरभ ने कहा कि, लाल झंडे के बीच फगवा का दखल बहुत बड़ी कामयाबी है। हालांकि डीयू की तर्ज पर जेएनयू में भी एबीवीपी या बीजेपी का सहयोग होता तो शायद तस्वीर इससे भी बेहतर होती। फिर भी हम पहले टॉप 3 में भी नहीं थे, लेकिन सीधे आइसा को चुनौती देकर उनके वोट बैंक में सेंध लगाना बड़ी कामयाबी है। हम छात्रों को इसी प्रकार जोड़ते रहेंगे।
कब-कब मिली है पहले बढ़त वर्ष 1999-2000 में एबीवीपी ने महज एक वोट से जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष पद जीता, लेकिन इसके अलावा अन्य सीटों पर दावेदारी जताने में नाकाम रहे। वर्ष 1996-1997 में सेंट्रल पैनल में उपाध्यक्ष पद जीता। वर्ष 1997-1998 में महज चार वोट से अध्यक्ष पद हार गए थे।