दिल्ली में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव की जंग में उतरी आम आदमी पार्टी (आप) की नजर भाजपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार पर टिकी है। इसके पीछे आप की रणनीति है कि विधानसभा चुनाव से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय स्तर के मसलों को दूर रखा जा सके। दिल्ली के मतदाता पार्टी की जगह मुख्यमंत्री पद के चेहरे और दिल्ली से जुड़े मसलों पर मतदान करें। बीते विधानसभा चुनाव में इसी रणनीति का फायदा आप को मिला था।
पांच साल तक सत्ता में रहने के बाद आप दोबारा से सरकार बनाने की जोर आजमाइश कर रही है। सिर्फ दिल्ली में सिमटी आप विधानसभा चुनाव को काफी अहम मान रही है। इसके लिए वह हर मोर्चे पर विपक्ष का चित करने की कोशिश में जुटी है। इसके लिए आप सरकार जनहित से जुड़ीं योजनाओं की घोषणा कर वोटरों को लामबंद करने में जुटी है।
वहीं, विपक्ष को चित करने के लिए भी सियासी चालें भी चल रही हैं। दूसरी तरफ पिछले करीब दो दशकों से दिल्ली की सत्ता से बाहर रही भाजपा एक बार फिर अपनी सरकार बनाने की मशक्कत में जुटी है। आप रणनीतिकारों को विपक्ष की सबसे कमजोर कड़ी उनके मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार में नजर आ रही है। पार्टी का मानना है कि विपक्ष में अभी कोई ऐसा चेहरा नहीं है जो शख्सियत की लड़ाई में अरविंद केजरीवाल को सीधी टक्कर दे सके।
इसके लिए बीते विधानसभा चुनाव की नजीर भी दी जाती है। उस वक्त किरण बेदी को मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पेश करना भाजपा को महंगा पड़ा था। आप रणनीतिकार मानते हैं कि उसके हमलों के दबाव में अगर भाजपा अपने मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार को घोषित कर देती है तो आप को एक मायने में शुरुआती बढ़त हासिल हो जाएगी। पिछले दिनों आप सांसद संजय सिंह समेत दूसरे वरिष्ठ नेताओं का भाजपा सांसद विजय गोयल को घेरना इसी रणनीति का हिस्सा रहा है।
स्थानीय स्तर पर चुनाव लड़ने की भाजपा की रणनीति
आप के सियासी झांसे में फंसने की जगह अभी पार्टी की रणनीति दो स्तरों पर चुनाव लड़ने की है। एक तरफ राष्ट्रीय मसलों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को दिल्लीवालों के बीच रखना है। वहीं, विधानसभा स्तर पर आप के विधायकों को उनके ही इलाके में घेरना है। दिल्ली के भाजपा नेताओं को कहा गया है कि वे अरविंद केजरीवाल और प्रदेश स्तर पर चुनावी लड़ाई लड़ने की जगह अपने-अपने इलाकों में आप के विधायकों को कठघरे में खड़ा करें।
दिलचस्प यह कि आप के ज्यादातर विधायक ही उसकी की सबसे कमजोर कड़ी हैं। ऐसे में इस पर वार करना भाजपा को सियासी तौर पर फायदे का सौदा लग रहा है। जानकारों को मानना है कि भाजपा की यह रणनीति तभी काम करेगी, जब आप अपने विधायकों को दोबारा टिकट दे दे। अगर आप अपने ज्यादातर उम्मीदवारों को बदलती है तो भाजपा को इसका ज्यादा फायदा नहीं मिल सकेगा।