विधानसभा अध्यक्ष रामनिवास गोयल का कहना है कि पूर्व प्रधानमंत्री से भारत रत्न वापस लेने की मांग मूल प्रस्ताव का हिस्सा नहीं है। उन्होंने कहा कि विधायक जरनैल सिंह भावावेश में पूर्व प्रधानमंत्री के नाम का जिक्र कर गए। सदन में रखे गए मूल प्रस्ताव में इसका जिक्र नहीं था। ऐसे में यह प्रस्ताव का हिस्सा नहीं माना जाएगा।
विशेषज्ञ बोले, पारित संकल्प विधानसभा की संपत्ति
इस मसले पर संविधानविदों का कहना है कि कोई संकल्प या प्रस्ताव सदन से पारित हो गया है तो वह विधानसभा की संपत्ति है। उसमें किसी तरह के बदलाव के लिए दोबारा प्रस्ताव लाना पड़ेगा। संविधानविद सुभाष कश्यप का कहना है कि उन्होंने सदन की कार्यवाही तो नहीं देखी, लेकिन इसकी एक प्रक्रिया है। सबसे पहले विधानसभा अध्यक्ष किसी सदस्य को संकल्प लाने के लिए सदन से इजाजत लेता है।
बहुमत का समर्थन मिलने के बाद संबंधित सदस्य संकल्प पढ़ता है। अध्यक्ष या किसी सदस्य को इस पर कोई आपत्ति है या वह संकल्प में कुछ संशोधन चाहता है तो वह उसे सदन के सामने रखता है। सदन का बहुमत इसके पक्ष है तो वह प्रस्ताव का हिस्सा होता है। अगर सदन की तरफ से कोई आपत्ति नहीं दर्ज कराई जाती और सदन उसे पास भी कर देता है तो प्रस्ताव सदन की संपत्ति हो जाता है। इसमें वह सभी बातें शामिल होती हैं, जिनका जिक्र संकल्प पढ़ने वाले सदस्य ने किया है।
जहां तक संकल्प वितरण का सवाल है तो जरूरी नहीं कि संकल्प पहले से सदस्यों को बांटा जाए। दूसरी तरफ, विधानसभा के पूर्व सचिव एसके शर्मा का कहना है कि यदि विधायक ने संकल्प पढ़ते समय कोई बात कही है और उस पर वोटिंग हुई है तो उसे संकल्प का ही हिस्सा माना जाएगा। इसे वापस लेने का तरीका एक है कि कोई विधायक नोटिस देकर नया प्रस्ताव विधानसभा की अगली बैठक में लाए।