दिल्ली ने सीधे-सीधे केंद्र सरकार से करों में हिस्सेदारी बढ़ाने की मांग विधानसभा के पटल से की है। उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने भाषण में कहा कि हम ज्यादा नहीं मांग रहे हैं, 100 रुपये में सिर्फ 65 पैसे मांग रहे हैं।
इतना मिलने पर ही दिल्ली सरकार को पांच साल में 25 हजार करोड़ रुपये मिल जाएंगे। यह हालत तब है जबकि दिल्ली आयकर, सेवा कर, एक्साइज व अन्य केंद्रीय करों से केंद्र सरकार को मिलने वाली कुल राशि में 16 फीसदी भागीदारी निभाती है।
‘आप’ सरकार केंद्र सरकार से सीधे टक्कर लेने के मूड में दिखाई दे रही है। दिल्ली सरकार केंद्रीय करों में हिस्सेदारी बढ़ाने की लड़ाई के अलावा दिल्ली में जमीन पर हक चाहती है।
ये है AAP सरकार का तर्क
तर्क है कि जनता के टैक्स के जिस पैसे का इस्तेमाल सुविधाएं विकसित करने के लिए किया जाना चाहिए, उसका बड़ा वित्तीय हिस्सा भूमि खरीदने में खर्च हो जाता है।
क्योंकि अन्य राज्यों की तरह यहां जमीन संसाधन उपलब्ध नहीं है। उप मुख्यमंत्री ने बुनियादी सुविधाओं के लिए निशुल्क भूमि उपलब्ध कराने की मांग रखी।
सिसोदिया ने शहर के विकास के लिए डीडीए के पास मौजूद संसाधनों को साझा किए जाने की मांग भी रखी है। डीडीए की नगर योजना में भी राज्य सरकार की सक्रिय भूमिका नहीं होती।
सरकारी खजाने में 50 करोड़ से भी कम बचेगा बैलेंस
ऐसे में शहर के व्यापक विकास के लिए एक महानगरीय योजना निकाय बनाने की जरूरत है जो अनियोजित बस्ती, अनधिकृत कॉलोनी और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए सामाजिक व भौतिक ढांचे के विकास संबंधी मुद्दो का समाधान भी करे।
दिल्ली सरकार के खजाने में बजट खर्च के बाद वित्त वर्ष 2015-16 में सिर्फ 49.64 करोड़ रुपये बचेगा। जो पिछले वित्त वर्षों के मुकाबले काफी कम है। मसलन सरकार को अगले साल खजाने के लिए अधिक पैसे जुटाने पड़ेंगे।
वित्त वर्ष 2012-13 में ओपनिंग बैलेंस 994 करोड़, 2013-14 में 1986 करोड़, 14-15 में 1762 करोड़ रुपये था। जिसे 2014-15 के संशोधित बजट में 881 करोड़ रहने का अनुमान है जबकि आगामी वित्त वर्ष 2015-16 में यह महज 49.64 करोड़ बचेगा।