नई दिल्ली।
दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में यह महत्वपूर्ण सवाल बड़े बेंच को भेज दिया है कि क्या सिविल मुकदमों में प्रतिवादी 120 दिन की निर्धारित समय-सीमा के बाद भी अपना लिखित बयान दाखिल कर सकते हैं। न्यायमूर्ति विवेक चौधरी और न्यायमूर्ति रेनू भटनागर की खंडपीठ ने इस मुद्दे पर पूर्व निर्णयों से असहमति जताई है। पहले के समन्वय बेंचों ने दिल्ली हाईकोर्ट (ओरिजिनल साइड) नियम, 2018 के तहत 120 दिन की समय-सीमा को अनिवार्य माना था और इसे बढ़ाने से इन्कार कर दिया था।
खंडपीठ ने प्रारंभिक राय व्यक्त की कि यह प्रावधान प्रक्रिया संबंधी है और इसे सर्वोच्च न्यायालय के उन फैसलों के अनुसार व्याख्यायित किया जाना चाहिए, जो असाधारण परिस्थितियों में समय-सीमा बढ़ाने की अनुमति देते हैं। अदालत ने कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट के नियमों की भाषा सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के संबंधित प्रावधान से काफी मिलती-जुलती है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देशात्मक (डायरेक्टरी) माना है, न कि अनिवार्य। मामला मूलरूप से एक वाणिज्यिक विवाद के रूप में दायर किया था। 5 मई 2025 को एकल न्यायाधीश ने इसे सामान्य सिविल मुकदमा माना। प्रतिवादियों ने निर्धारित अवधि में लिखित बयान दाखिल नहीं किया, जिसके बाद जॉइंट रजिस्ट्रार ने 20 जनवरी 2026 को उनका अधिकार बंद कर दिया। एकल न्यायाधीश ने 23 जुलाई 2026 को इस फैसले को बरकरार रखा। प्रतिवादियों ने खंडपीठ के समक्ष चुनौती दी। खंडपीठ ने कहा कि लिखित बयान दाखिल करने की समय-सीमा बढ़ाने का अधिकार केवल न्यायालय के पास है, जबकि रजिस्ट्रार केवल प्रशासनिक शक्तियां रखते हैं। खंडपीठ ने 120 दिन की समय-सीमा, रजिस्ट्रार की शक्तियों और उनके आदेशों के खिलाफ अपील संबंधी तीन प्रश्न बड़े बेंच को भेज दिए।