उर्दू में कथा राधेश्याम भी मौजूद
संवाद न्यूज एजेंसी
नई दिल्ली। जामिया हमदर्द विश्वविद्यालय के संग्रह में करीब 760 साल पुरानी दुर्लभ पांडुलिपियां मिली हैं। इनमें 1266 ईस्वी की अरबी पांडुलिपि इजाह-उल-मआनी अला अल-तल्खीस और उर्दू में लिखी कथा राधेश्याम प्रमुख हैं। यह खोज भारत की समृद्ध भाषाई और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती है।
इजाह-उल-मआनी अला अल-तल्खीस को अब तक की सबसे पुरानी अरबी पांडुलिपियों में से एक माना जा रहा है। यह 1266 ईस्वी की है और अरबी भाषा के इल्म-ए-मआनी तथा बलागत से संबंधित है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह ग्रंथ शास्त्रीय अरबी साहित्य और कुरआनी पाठ के सूक्ष्म अर्थों को समझने में शोधकर्ताओं की मदद करेगा। कथा राधेश्याम का उर्दू में होना विशेष महत्व रखता है। यह उस दौर के भाषाई संवाद और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का प्रमाण है। यह दर्शाता है कि भारतीय कथाएं किसी एक भाषा या समुदाय तक सीमित नहीं थीं। संग्रह में यूनानी चिकित्सा परंपरा से संबंधित अल-कानून फिल-तिब्ब भी शोध के लिए महत्वपूर्ण है। यह चिकित्सा ज्ञान के विकास और उसके एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचने की प्रक्रिया को समझने में भी सहायक है।
संरक्षण और डिजिटलीकरण
विश्वविद्यालय ने अपनी पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण शुरू कर दिया है। इसके लिए एक डिजिटलीकरण प्रयोगशाला भी स्थापित की गई है। पांडुलिपियों के संरक्षण और दीर्घकालिक देखभाल के लिए संरक्षण इकाई स्थापित करने की प्रक्रिया चल रही है। यह पहल सदियों पुरानी इस विरासत को सुरक्षित रखने में मदद करेगी।
ज्ञान भारतम् मिशन में भूमिका
जामिया हमदर्द ने दिसंबर 2025 में ज्ञान भारतम् के साथ एक समझौता किया था। इस मिशन के तहत विश्वविद्यालय को एक क्लस्टर केंद्र बनाया गया है। यह देशभर के 20 तक क्लस्टर साझेदार केंद्रों के काम का समन्वय और निगरानी भी कर रहा है।