ग्रहों की चाल से इस साल दुर्लभ संयोग बनने जा रहा है। 19 जून को गुरु अपनी उच्च राशि कर्क में प्रवेश कर रहे हैं। शनि अपनी उच्च राशि तुला में पहले से ही विराजमान हैं।
13 जुलाई 2014 को राहु-केतु भी अपनी उच्च राशि कन्या और मीन में पहुंच रहे हैं। ग्रहों का अपनी-अपनी उच्च राशि में एक साथ होने का यह दुर्लभ संयोग 296 वर्ष बाद बन रहा है।
ग्रहों की इन स्थितियों पर ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि इससे देश की आर्थिक और राजनीतिक स्थिति में सुधार होगा। 19 जून से 13 माह तक गुरु अपनी उच्च राशि में बनें रहेंगे, मगर 8 दिसंबर के बाद से गुरू वक्री हो जाएंगे। 1 नवंबर 2014 को शनि अपनी राशि तुला से वृश्चिक राशि में प्रवेश करेंगे।
पंडित राजेश शर्मा ने बताया कि शनि व गुरु दोनों राजयोग कारक होते हैं। सातवें स्थान पर शनि के रहने का प्रभाव चौथे और आठवें स्थान पर भी रहेगा। इससे राजनीतिक व्यवस्था को स्थिरता मिलेगी, जबकि देश की राज्य सरकारों में अस्थिरता का योग बन रहा है।
शिवशंकर ज्योतिष अनुसंधान के ज्योतिषाचार्य शिवकुमार शर्मा बताते हैं कि गुरु 12 वर्षों से अधिक में अपना चक्र पूरा करते हैं। वे अपनी उच्च राशि में 13 माह तक बने रहेंगे। बीच में गुरु के वक्री होने से व्यक्तिगत नुकसान संभव है, जबकि राष्ट्रहित के लिए यह शुभ साबित होंगे।
इस ग्रह परिवर्तन से नेताओं के आचरण दोष उजागर हो सकते हैं। भ्रष्टाचार और आपराधिक मामलों में देश में कमी हो सकती है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए लाभकारी होगी। देश के अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में परिवर्तन आएंगे और समीपवर्ती देशों से भारत के संबंध सुधरेंगे। ग्रहों की चाल से समाज में जागरूकता और महिलाओं की स्थिति में सुधार होगा।