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1984 सिख विरोधी दंगे: सज्जन के खिलाफ सरस्वती विहार दंगा केस में सुनवाई पूरी, पीड़ित पक्ष के वकील ने रखी दलीलें

Fri, 25 Oct 2024 08:50 AM IST
अनुज कुमार अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली

सार

सीबीआई और बचाव पक्ष के वकील पहले ही दलीलें पूरी कर चुके हैं। बहस के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता एच एस फुल्का ने दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले का हवाला दिया और कहा कि यह कोई अलग मामला नहीं है, यह बड़े नरसंहार का हिस्सा है।
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1984 सिख विरोधी दंगे - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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नवंबर 84 दंगो के मामले में पीड़ितों ने कहा कि पुलिस जांच में हेराफेरी की गई। पुलिस जांच धीमी थी और आरोपियों को बचाने के लिए ऐसा किया गया। यह मामला एक नवंबर 1984 को सरस्वती विहार इलाके में जसवंत सिंह और उनके बेटे तरुणदीप सिंह की हत्या से जुड़ा है। राउज एवेन्यू कोर्ट ने बृहस्पतिवार को कांग्रेस के पूर्व सांसद सज्जन कुमार के खिलाफ सिख विरोधी दंगा मामले में अंतिम दलीलें पूरी करते हुए दंगा पीड़ितों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी। 

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अब आठ नवंबर को होगी सुनवाई
यह दलील दी गई कि दंगों के दौरान स्थिति असाधारण थी। इसलिए इन मामलों को इसी संदर्भ में निपटाया जाना चाहिए। दलीलें सुनने के बाद विशेष न्यायाधीश कावेरी बावेजा ने मामले को स्पष्टीकरण के लिए आठ नवंबर को सूचीबद्ध किया है। 

बचाव पक्ष ने मांगी फैसले की कॉपी
इस बीच कोर्ट ने बचाव पक्ष के वकील से उस फैसले की कॉपी दाखिल करने को कहा है जिस पर उन्होंने भरोसा किया है। आगे तर्क दिया गया कि आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 1984 में दिल्ली में 2700 सिख मारे गए थे। यह कोई सामान्य स्थिति नहीं थी। वरिष्ठ अधिवक्ता फुल्का ने 1984 के दिल्ली कैंट मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले का हवाला दिया जिसमें अदालत ने दंगों को मानवता के खिलाफ अपराध कहा था। यह भी कहा गया कि नरसंहार का उद्देश्य हमेशा अल्पसंख्यकों को निशाना बनाना होता है। सज्जन कुमार की ओर से अधिवक्ता अनिल कुमार शर्मा, एस ए हाशमी, अनुज शर्मा पेश हुए।
 

हत्या मामले में बरी लोगों के खिलाफ अपील में 27 साल की देरी को माफ करने से हाईकोर्ट का इनकार
उच्च न्यायालय ने 1984 के सिख दंगों के एक मामले में तीन आरोपियों को 27 साल से अधिक की देरी के बाद बरी किए जाने के फैसले को चुनौती देने के लिए राज्य को अनुमति देने से इनकार कर दिया है। न्यायमूर्ति प्रतिभा एम सिंह और न्यायमूर्ति अमित शर्मा की पीठ ने कहा कि वह बड़े पैमाने पर जान-माल के नुकसान से अवगत है, लेकिन वह अभियोजन पक्ष द्वारा अपील दायर करने में लंबी देरी को माफ नहीं कर सकती। 
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अभियोजन पक्ष ने अपील करने की अनुमति मांगते हुए अदालत से हत्या और दंगा मामले में 29 जुलाई, 1995 को पारित बरी किए गए ट्रायल कोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील दायर करने में 10,165 दिनों की देरी को माफ करने का आग्रह किया। याचिका को खारिज करते हुए पीठ ने कहा लंबी देरी और इसी तरह के मामलों में समन्वय पीठ के फैसलों को देखते हुए, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है, देरी को माफ नहीं किया जा सकता। इसलिए अपील करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। 

दूसरी ओर, अभियोजन पक्ष ने कहा था कि हिंसा से संबंधित मामलों की जांच के लिए दिसंबर 2018 में न्यायमूर्ति एस एन ढींगरा समिति का गठन किया गया था और अप्रैल 2019 में इसकी रिपोर्ट आने के बाद आंतरिक समीक्षा की गई और अपील दायर करने के लिए मामलों को संसाधित किया गया। 31 अक्टूबर, 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके सिख सुरक्षा गार्डों द्वारा हत्या के बाद दिल्ली में सिख समुदाय के सदस्यों के खिलाफ बड़े पैमाने पर हिंसा भड़क उठी थी।
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