गीता ने बताया कि दिव्यांग होना समाज में आपको कैसा महसूस कराता है, यह वह जानती थी। इसलिए वह दिव्यांग बच्चों के लिए कुछ करना चाहती थी। गीता ने बताया कि दिव्यांग बच्चे को देखकर उन्हें अपना बचपन याद आता था। इसलिए उन्होंने नौकरी छोड़ दिव्यांग बच्चों की जिंदगी संवारने की ठानी।
स्पीच थैरेपी और ऑडियोलॉजी के जरिये वह लगभग एक हजार से अधिक बच्चों को इलाज कर चुकी हैं। गीता मूलरूप से यूपी से हैं। 2003 में वह दून आईं और विशेष आवश्यकता वाले बच्चों एवं दिव्यांगों के लिए स्पीच थैरेपी, ऑडियोलॉजी एवं विशेष शिक्षा का सेंटर शुरू किया। उन्हें कई पुरस्कारों से भी सम्मानित किया जा चुका है।
दिव्यांगों के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण और उपेक्षा के कारण सामाजिक चुनौतियां जटिल हो जाती हैं। शारीरिक या मानसिक निशक्तता और सामाजिक रवैये के कारण समाज की मुख्य धारा के साथ कदमताल करने में दिव्यांग खुद को कमतर महसूस करते है। जीवन निर्वहन में कदम-कदम पर कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में दिव्यांगों का सामाजिक रूप से आत्मनिर्भर और स्वावलंबी होना आवश्यक है। इसलिए उन्हें सामान्य शिक्षा के स्थान पर विशिष्ट शिक्षा की आवश्यकता पड़ती है। मुझे मेरे परिवार का सहयोग मिला, लेकिन हर दिव्यांग को यह नहीं मिलता। उन्हें भी एक सामान्य जीवन जीने का हक है।
- डॉ. गीता सोनी, स्पीच थेरेपिस्ट