बृहस्पतिवार तड़के करीब चार बजे पत्नी उठी तो देखा कि राजेंद्र सिंह के कमरे की लाइट ऑन थी। उन्हें लगा कि शायद राजेंद्र भी जाग गए हैं, लेकिन जब उन्होंने आवाज लगाई तो अंदर से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई और दरवाजा भी अंदर से बंद था।
राजेंद्र भी लगभग साढ़े चार बजे के आसपास जाग जाते थे, ऐसे में उन्हें चिंता हुई तो उन्होंने बेटे मोनू को आवाज लगाई। मोनू ने मां और बहन के साथ मिलकर किसी तरह दरवाजा तोड़ा तो राजेंद्र खून में लथपथ बाथरूम में पड़े हुए थे। उनके गले पर फंदेनुमा तौलिया बंधा हुआ था, जिसका एक सिरा ऊपर खिड़की की जाली से बंधा हुआ था। पास ही में ब्लेड का रैपर और दूसरी तरफ ब्लेड पड़ा हुआ था।
नजारा देखकर पत्नी चिल्लाई तो आसपास के लोग भी उनके घर पहुंच गए। सूचना मिलने पर पुलिस मौके पर पहुंची। घटनास्थल को देखकर मामला हत्या का लग रहा था। थोड़ी देर बाद इंस्पेक्टर राजेश साह, अन्य अधिकारी और फोरेंसिक जांच टीम भी पहुंच गई। उन्होंने परिजनों से पूछताछ की तो साफ हुआ कि राजेंद्र सिंह ने आत्महत्या की है।
इंस्पेक्टर राजेश साह ने बताया कि शव के पास से सुसाइड नोट मिला है। परिजनों के अनुसार यह लिखावट राजेंद्र सिंह की ही है। चूंकि, कमरा अंदर से बंद था और परिजन उसे तोड़कर अंदर दाखिल हुए थे, यह बात भी आत्महत्या की ओर ही इशारा करती है। फिलहाल कोई शिकायत नहीं आई। उन्होंने बताया कि यदि शिकायत आती है तो मुकदमा दर्ज किया जाएगा।
सुसाइड नोट में कुल सात अधिकारियों और कर्मचारियों के नाम राजेंद्र सिंह ने लिखे हैं। लिखा है कि ये लोग उन्हें फंसाने की कोशिश कर रहे थे। इस बात को लेकर उन्होंने कई बार विभाग को भी लिखा था। इंस्पेक्टर राजेश साह ने बताया कि घर में उनके द्वारा लिखे गए पत्रों को तलाश किया गया तो उनके जवाबी पत्र भी बरामद हुए। इन सभी के जवाब भी विभागीय अधिकारियों ने उन्हें दिए हैं। पत्रों में अधिकारियों ने लिखा है कि जिसे राजेंद्र सिंह प्रताड़ना बता रहे हैं वह सरकारी काम है।
घर में रहते थे परेशान
राजेंद्र सिंह का बड़ा बेटा केरल में बैंक पीओ है और दूसरा बेटा जोधपुर में प्राइवेट कंपनी में काम करता है। जबकि, सबसे छोटा बेटा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा है। छोटे बेटे मोनू ने बताया कि पिता बार बार कार्यालय की बातें बताते थे और परेशान हो जाते थे। परिजन उन्हें समझाने का प्रयास भी करते थे, लेकिन उनकी परेशानी कम नहीं होती थी।
अपना घर न होने से भी थे परेशान
राजेंद्र सिंह इस प्रयोगशाला में पिछले 18 सालों से तैनात थे। वे जनवरी को सेवानिवृत्त होने वाले थे। उन्होंने अपना मकान नहीं बनवाया था, इस बात को लेकर भी वे परेशान रहते थे। इस बात को भी उन्होंने सुसाइड नोट में लिखा है कि वे इस बात को लेकर परेशान हैं कि आजतक वे अपना मकान नहीं बनवा पाए।