आजादी के लिए बिलखती और छटपटाती संवासिनियों ने शुक्रवार को नारी निकेतन की हकीकत को बेपर्दा कर दिया। कैदखाने से भी बदतर हालात में जी रही संवासिनियों ने अमर उजाला को अपनी नारकीय जिंदगी की दास्तां सुनाने के बाद अपनी मुक्ति के लिए गुहार भी लगाई।
तमाम दबावों के बावजूद संवासिनियों ने अपनी व्यथा को बताया। इस दौरान बहुत कुछ छिपाने की घबराहट में अधिकारी सुरक्षा गार्डों के अंदाज में दिखे। नारी निकेतन में मेडिकल कैंप की नुमाइश के लिए शुक्रवार को मीडिया कर्मियों को दाखिल होने दिया गया।
इस बीच पिंजरे में कैद पक्षी की तरह फड़फड़ा रहीं संवासिनियों ने सच को सामने ला दिया। परिसर में मीडिया कर्मियों को देख संवासिनियां उनके पास आईं और अपनी आजादी के लिए गुहार लगाई। रोती-गिड़गिड़ाती एक संवासिनी अमर उजाला की संवाददाता से लिपट गई।
यह देख समाज कल्याण अधिकारी रामअवतार सिंह संवाददाता को दूसरी ओर जाने के लिए कहने लगे। मौका मिलते ही वह इशारों में संवासिनियों को डराते भी रहे। संवाददाता के नहीं हटने पर अधिकारी आपे से बाहर हो गए। वह महिला पत्रकार से अभद्रता करने से बाज नहीं आए।
नजरे हटते ही बात करने लगती संवासिनियां
संवासिनियां अमर उजाला संवाददाता को अपना दुखड़ा सुनाना चाहती थीं। यही वजह थी कि वह अधिकारियों का ध्यान हटते ही संवाददाता के पास पहुंच जाती। डॉक्टरों से जांच के बहाने किनारे खड़ी पंजाब की शिल्पा संवाददाता के सामने रो पड़ी।
बोली कि मैम जी, मुझे घर जाना है। मेरे घर वालों को नहीं पता कि मैं यहां हूं। मैं अपना घर भूल गई थी तो यहां पहुंच गई लेकिन ये लोग मुझे घर नहीं भिजवा रहे हैं। बिहार की संवासिनी संवाददाता के पैरों में गिर गई। बोली कि मैम हमें घर जाना है।
अपराधी क्यूं कहा जाता है
यहां हमारे साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया जाता। बाहर के किसी व्यक्ति से मिलने नहीं दिया जाता। बाहर भी नहीं जाने दिया जाता है।
बांग्लादेश की तमन्ना और आरजू स्पष्ट शब्दों में मीडिया वालों से बात कर रही थी। इसके बावजूद समाज कल्याण अधिकारी यह कहने से बाज नहीं आए कि ये हिंदी नहीं समझतीं।
इन दोनों संवासिनियों का कहना था कि मैम हमने चोरी-मर्डर नहीं किया है, फिर हमें अपराधी क्यूं कहा जाता है। शहनाजपुर की सीमा एक ही रट लगाए हुए थी कि हम यहां परेशान हैं, हमें घर जाना है।
उम्मीद भरे चेहरों पर दिखी खुशी
मेडिकल कैंप के बहाने संवासिनियों को कोई उनका दुखड़ा सुनने वाला मिला तो उन्हें कुछ उम्मीद बंधी। बाहरी लोगों से न मिल पाने की वजह से परेशान संवासिनियों के चेहरों पर कुछ देर के लिए खुशी छा गई।
लौटते मीडियाकर्मी को संवासिनियां देखती रहीं। हालांकि उन्हें फटकार भी मिली लेकिन जब तक लोग ओझल नहीं हो गए संवासिनी कमरों के बाहर खड़ी रहीं।