गोरक्षा की आड़ में हिंसा करने वाले लोगों को देहरादून की नमिता नारायण से गोसेवा सीखने की आवश्यकता है।
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विवाह तक नहीं किया
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namita narayan
गायों के प्रति अपना जीवन समर्पित करने वाली नमिता नारायण का कहना है कि वे इस दुनिया से विदा होने से पहले अपनी संपत्ति की वसीयत में गायों के संरक्षण के लिए एक हिस्सा निर्धारित करेंगी। देश भर में कथित गोरक्षकों द्वारा की जा रही हिंसा पर बवाल मचा है। इस मुद्दे पर खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सामने आना पड़ा।
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सरकार या किसी संस्था से कोई मदद नहीं लेती
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ऐसे में गो सेवा को अपने जीवन का लक्ष्य बनाने वाली नमिता की चर्चा मौजू है। उन्होंने चालीस साल पहले घर में गो सदन की स्थापना की और अब तक सौ से अधिक गायों और गोवंश का लालन-पालन कर चुकी हैं।
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कानून की उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद नमिता ने न वकालत की न ही नौकरी। वह गायों की सेवा में इतनी लीन हो गईं कि उन्होंने विवाह तक नहीं किया। 70 वर्षीया नमिता, जीवन की सांझ में भी अपने दत्तक पुत्र शिवम के साथ गायों की देखभाल में कोई कमी नहीं आने देती।
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नमिता नारायण का कहना है कि वे अपनी वसीयत में गायों के संरक्षण के लिए एक हिस्सा निर्धारित करेंगी। जिससे उस धनराशि से उनके द्वारा बनाए गए सदन में गायों का संरक्षण होता रहे। शहर के डालनवाला क्षेत्र में निमी रोड पर रहने वाली नमिता नारायण बेहद संपन्न और प्रतिष्ठित राजस्थानी मारवाड़ी परिवार से हैं। उनके पिता बाल कृष्ण कोठारी नारायण महान कवि, लेखक वित्त मामलों के जानकार थे।
नमिता ने अपने घर में बनाए सदन में गायों, बछड़ों के लिए विशेष टीन शेड बनवाए हैं, सूखा और हरे चारे की व्यवस्था रहती है। खुद बीमार रहती हैं तो उनका दत्तक पुत्र शिवम और एक माली सदन में मौजूद गायों की देखभाल करते हैं। इस पुण्य कार्य में आने वाले खर्च को वो अपनी पैतृक संपत्ति से अर्जित आय से खर्च करती हैं। सरकार या किसी संस्था से कोई मदद नहीं लेती। उनका कहना है कि उनको भगवान ने गो सेवा करने के लिए पर्याप्त दिया है, तो मदद की कोई आवश्यकता नहीं होती।