जुलाई 2021 से अब तक दो सर्वेक्षण हो चुके
लार्वा आमतौर पर पत्तियों और नम मिट्टी के नीचे रहना पसंद करते हैं। लेकिन, देश और दुनियाभर में सीमेंट के पक्के निर्माण कार्य की वजह से जमीन घटती जा रही है। इससे जुगनू धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं। भारतीय वन्य जीव संस्थान के वैज्ञानिक एंबर फाउंडेशन की अध्यक्ष एवं शोध छात्रा निधि राणा संग मिलकर जुगनुओं की संख्या का पता लगा रहे हैं। उनका कहना है कि जुलाई 2021 से अब तक दो सर्वेक्षण हो चुके हैं, जबकि इस साल इस सप्ताह में तीसरा सर्वेक्षण चल रहा है।
इसके लिए लोगों का भी सहयोग लिया जा रहा है। संस्थान की ओर से ऑनलाइन पोर्टल से वन विभाग, विवि, पर्यावरण कार्यकर्ताओं सहित पांच हजार से अधिक लोगों एवं संस्थानों से अपने आसपास के जुगनुओं के बारे में जानकारी ली जा रही है। एंबर फाउंडेशन की अध्यक्ष निधि राणा बताती हैं कि दून घाटी के जुगनुओं की विविधता और उनकी आबादी पर मानव जनित दबाव के प्रभाव का भी आकलन किया जा रहा है।
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जुगनू के पेट में होता है रोशनी देने वाला गुण
भारतीय वन्य जीव संस्थान के वैज्ञानिकों के मुताबिक, जुगनू में अंडे से लेकर वयस्क तक सभी अवस्थाओं में चमकने की क्षमता होती है। यह रोशनी देने वाला गुण उनके पेट में एंजाइम-सब्सट्रेट कॉम्प्लेक्स यानी लूसिफेरेज-ल्यूसिफेरिन की उपस्थिति के कारण होता है।
जुगनू वातावरण के अच्छे सूचकांक हैं, जो खत्म हो रहे हैं, देशभर में इनकी संख्या का पता लगाया जा रहा है। भारत के अलावा विश्व के अन्य देश भी अपने-अपने यहां इस काम में जुटे हैं। -वीपी उनियाल, पूर्व वरिष्ठ वैज्ञानिक भारतीय वन्यजीव संस्थान